

दादी जानकी जी के साथ प्रश्न-उत्तर: प्रश्न: मुरली सुनते समय व्यर्थ संकल्प न आए उसके लिए क्या साधन है? उत्तर: “हे व्यर्थ संकल्प, क्या तुम इतने पावरफुल हो कि बाबा की मीठी मुरली सुनते समय उसमें इंटरफेयर कर सको?” पुराने संकल्प और पुराने संबंध ही व्यर्थ को आगे ले आते हैं। मुरली में इतनी शक्ति है कि वह हमें सभी व्यर्थ से छुड़ा देती है। व्यर्थ संकल्प से छुटकारा तब तक नहीं मिल सकता जब तक अमृतवेला अच्छा नहीं है। सुबह 4 बजे से लगभग 8 बजे तक मानो हमारी बुद्धि प्रभु-हवाले होती है। प्रश्न: मुरली क्या है? उत्तर: भक्ति मार्ग में इसे श्रीमत भगवत गीता कहते हैं। (मुरली सुनते समय) जिसका ध्यान इधर-उधर चला जाता है, वह ऊँच पद नहीं पा सकता। जितना बड़ा संगठन है, उतना ही पता चलता है कि मेरी बुद्धि, बाबा की बातों को कितना जानती, समझती और धारण करती है। बाबा का अच्छा बच्चा वह है जिसको तपस्या में दिल लगता हो। हम सारा कल्प संबंध में आते रहे हैं, लेकिन बाबा पूरे कल्प में एक बार बच्चों के साथ संबंध में आते है। प्रश्न: स्व-उन्नति के लिए कैसे सोचें? उत्तर: अभी भी समय है, अभी भी चांस है। मेरे दिल में बाबा, और बाबा के दिल में मैं — इसके लिए जिस भी युक्ति की आवश्यकता हो, उसे बनाएं। सबसे आराम का स्थान है बाबा का दिल। बाबा हमारे दिल में तब रहता है जब नैनों में प्रेम की एक बूंद हो। प्रश्न: बिछड़ी हुई आत्माओं को बाबा जो पास ला रहा है, उस कार्य में मैं बाबा की मददगार कैसे बन सकती हूँ? उत्तर: सर्वशक्तिमान से जो शक्ति मिल रही है उसे व्यर्थ में न गंवाएँ। बाबा ने विल में हमें क्या दिया है? — शक्ति। जो बाप से विल में मिला है उसे बाँटना है। इसलिए बाबा के सम्मान के लिए स्व-अटेंशन रखना आवश्यक है — निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी — इन तीन बातों में हम कहाँ तक पास हुए हैं। निराकारी स्थिति ही निर्विकारी और योगी बनाती है। बहुत अटेंशन देने से निराकारी स्थिति बनती है। किसी बात का टेंशन न हो — इस बात पर मुझे बहुत अटेंशन रखना है। फिक्र करने की आदत पुरुषार्थ में बहुत रुकावट डालती है। यदि किसी भी बात की फिक्र न करें तो फखुर में रहेंगे। फखुर में रहने से सब बातें सहज हो जाती हैं। योग-बल को बढ़ाते रहो — सब कार्य सहज होते जाएंगे।