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Spiritual Classes

17-Dadi Brijandra ji

Dadi Brijendra Ji
60:14263
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17-Dadi Brijandra ji
Dadi Brijendra Ji
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Essence

यज्ञ इतिहास – दादी बृजेंद्रा जी की जुबानी

शिवबाबा, जो सबसे बड़ा बाप है, उन्होंने धीरे-धीरे पुराने तन को अपना रथ बनाया और नई दुनिया अर्थात आदि दुनिया को बनाने के लिए निमित्त चुना।

विदेही, अंतर्मुखी, एकांतवासी बनकर, शिवबाबा ने अपने मुरब्बी बच्चे से गहन पुरुषार्थ कराया।

बाबा बनारस गए। वहाँ मूलचंद का बंगला था, जहाँ वे रहने जाते थे। पत्र भी लिखते थे — वह भी न्यारे और प्यारे।

(किसी का नाम नहीं लिखा गया) — "खजाने के पास जा रहा हूँ।" फिर पत्र आया — "मैं खजाने के पास पहुँच गया।" फिर आया — "खजाने की चाबी मिल गई है, अब मैं ज्ञान रत्नों से मालामाल हो गया हूँ। पा लिया जो पाना था, अब कुछ पाने को नहीं बचा।" — पत्र समाप्त। यह लेटर का सैंपल बताया।

बाबा को संकल्प आया कि अब यह बिजनेस नहीं करना है। तो कलकत्ता गए। बाबा का आकर्षण रजवाड़ों की ओर बहुत था, क्योंकि उन्होंने धर्म को पहले और धन को बाद में रखा। बाबा की आँखें बहुत तीव्र थीं, हीरे पहचानने में।

जब हीरों का पैकेट नीचे गिरा, तो उन्हें प्रैक्टिकल में पत्थर दिखाई दिए। बाबा उठे और पार्टनर से कहा — "मुझे अब छुट्टी दो क्योंकि ये तो पत्थर दिखाई दे रहे हैं। इनकी क्या वैल्यू दूँ?"

सिंध में बाबा एकांतवासी बन गए। एक दिन जशोदा मइया के गुरु आए। बाबा उठकर अपने कमरे में चले गए। जशोदा माँ ने देखा कि बाबा तपस्या में बैठे हैं। मैं भी पास जाकर बैठ गई। बाबा की आँखों में लाली और चेहरे पर प्रकाश था। समय का होश खो गया। फिर ऐसा अनुभव हुआ कि कोई ऊपर से बाबा के तन में प्रवेश कर रहा है।

शिवबाबा उस दिन प्रवेश कर गए। सोचो, उनकी आँखों में कितनी लाली रही होगी, कमरे में कितना प्रकाश हुआ होगा। बाबा के मुख से बुलंद आवाज़ में निकला —
"निजानंदस्वरूपम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्, प्रकाशस्वरूपम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्, आनंदस्वरूपम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्, ज्ञानस्वरूपम् शिवोऽहम् शिवोऽहम्।"

बाबा तीन-चार बार ऊपर-नीचे देखने लगे। कौन था? बहुत लाइट और माइंट था। उसने कहा — "तुमको सतयुग की दुनिया रचनी है।" कैसे रचनी है, यह बताया नहीं। रत्नजड़ित सोने के महल, बड़े बगीचे, ऊपर से स्टार्स नीचे आते हैं और मोर मुकुटधारी राजकुमार-राजकुमारी बनते हैं। बहुत सुंदर दुनिया। फिर बाबा की आँखें बंद हो गईं।

बाबा ने लिखना शुरू किया — अनेक नोटबुक्स लिखीं: "मैं आत्मा, मैं आत्मा..." अगले दिन: "जशोदा आत्मा, राधा आत्मा..." — ऐसे लिखा।

स्टेप-बाय-स्टेप देह और विदेही का पाठ पढ़ाना शुरू हुआ। शरीर से न्यारे करना शुरू किया। “ॐ” के अर्थ में स्थित कराया।
कोई सामने बैठता तो विदेही बन जाता। बात फैलने लगी।
फिर ध्यान दीदार का पार्ट शुरू हुआ। मनमोहिनी दीदी को स्वप्न आया — "मैं आ गया हूँ, जशोदा निवास में।"
बाबा ने स्वयं संदेश दिया —
"मैं आ गया हूँ। आओ मेरी निज आत्म सखी।"
ऐसे बिछड़े हुए फिर से मिले। बच्चों को जगाया।

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