

दादी जी ने कक्षा में सूक्ष्म पवित्रता, अपवित्रता और योगबल को स्पष्ट किया तथा सभी के प्रश्नों का स्पष्टीकरण भी दिया। मुझे राजयोगी, कर्मयोगी, सहजयोगी और शुद्धयोगी बनना है। बाबा ने रॉयल्टी से समझाया है कि रॉयल पैसेंजर न तो अपना लगेज स्वयं उठाते हैं और न ही हाथ में रखते हैं। बाबा कहते हैं—तुम मेरे रॉयल बच्चे हो, इसलिए जिस चीज़ की आवश्यकता है, उसे पहले से ही रवाना कर दो। दृढ़ और शुद्ध संकल्प कमाल का काम करता है। ऐसे संकल्पों में बाबा की मदद अवश्य मिलती है—यही है संकल्प की शुद्धता। भले ही बाहर कितना भी शोर-गुल क्यों न हो, यदि अंदर बाबा की शक्ति खींचती रहेंगे, तो आवाज़ से परे जाना सहज होगा। बाबा कहते हैं, सारी पढ़ाई का सार है—अपने को आत्मा समझो और मुझ बाप को याद करो। जब यह अभ्यास कम होता है, तब दुख-सुख, निंदा-अपमान में हलचल शुरू हो जाती है। इसलिए जैसा मेरे बाबा का स्वभाव है, वैसा ही मेरा निजी स्वभाव भी बन जाए। ब्राह्मण जीवन का अर्थ है—बोलना, चलना, खाना और रहना सब कुछ बदल जाना। न कोई चिंता हो और न कोई फिक्र हो। सदा अलर्ट रहना है—सुस्त नहीं रहना, बहाने नहीं बनाने और झूठ नहीं बोलना है। जो भी कार्य हम करते हैं, वह योगबल से करते हैं। योग का आधार पवित्रता है। पवित्रता के बिना योग नहीं लगता और योग के बिना बल नहीं मिलता। कोई भी अपवित्र संकल्प आत्मा को ऊपर उड़ने नहीं देता, इसलिए पवित्रता में ही शुद्धता, स्वच्छता और ईमानदारी हो। बाबा ने सिखाया है—सब संग तोड़ो, एक संग जोड़ो। एक संग जुड़ते ही बाकी सब संग अपने आप ही टूट जाते हैं। विचार सागर मंथन करते-करते आत्मा स्वयं बाबा के पास पहुँच जाती है।