

यज्ञ इतिहास – दादा नारायण (ब्रह्मा बाबा के लौकिक पुत्र) की जुबानी बड़े भाई और मुझमें १६ वर्ष का अंतर था। घर का वातावरण शुद्ध और पवित्र रहता था। ज्ञान क्या है, यह जानने के लिए हमने कई गुरुओं से मार्गदर्शन लिया। परमात्मा से मिलने की आशा बाबा को थी। हम जो दिव्य आत्माएं हैं, उनकी शक्तियाँ समय के साथ कमजोर हो गई थीं। संगम युग में ट्रांसफर होकर हमारे अंदर फिर से शक्तियाँ जागृत हों, इसके लिए हमें मेहनत करनी है, ताकि आने वाले युग में परिवर्तन ला सकें। १९३६ में बाबा को साक्षात्कार हुआ। मेरे अनुसार बाबा की प्रवेशता अचानक नहीं थी। उन्होंने अपने अंदर बहुत गहराई से परिवर्तन किया। रोज़ रात को और दिन में तीन घंटे अकेले रहते, आत्मचिंतन में लीन रहते। एकांत के लिए हम 5–6 महीने के लिए कश्मीर भी गए। वहाँ से लौटने के बाद ॐ निवास बनाया गया। उसके ऊपर के फ्लोर को डॉरमेट्री के रूप में बनाया ताकि सब आराम से रह सकें। वहीं से पढ़ाई भी शुरू हुई। जशोदा मइया प्रेरणा का स्रोत थीं और शिव की भक्त थीं। जशोदा मइया के लिए यह बहुत कठिन था कि एक पतिव्रता नारी होते हुए अपने पति को बाबा की दृष्टि से स्वीकार करें। इसके लिए भावना और वृत्ति पूरी तरह से बदलनी पड़ी। माताओं ने अपने भाग्य बनाने के लिए बहुत कठिनाइयों का सामना किया, इसलिए आज वे हमारे साथ हैं। विश्वकिशोर दादा, बाबा के बड़े भाई के बेटे थे। वे बहुत चतुर और संपूर्ण रूप से समर्पित थे। दादा की युगल का नाम संतरी था। उन्होंने अपना पूरा कारोबार अपने भाई को सौंपा और बाबा का पत्र पढ़ते ही सेवा में समर्पित हो गए — ऐसा था उनका समर्पण। मम्मा की पालना मुझे बहुत मिली। मैं बाबा के पीछे-पीछे रहता था। बाबा आने वाले समय के बारे में गुप्त चेतावनियाँ देते थे और कहते थे — “मेरे कदम पर कदम रखना।” तूफानों का सामना पहले मैं करता हूँ। बाबा के बाल मैं ही काटता था। मैंने जीवन में कभी किसी से कुछ नहीं माँगा। जब मैं माउंट आबू पहुँचा, तो यह संकल्प आया कि इतनी माताएँ जिन्होंने इतनी कुर्बानी दी है — आज वे बेगैर हैं। तब मैंने विश्वकिशोर दादा से मुंबई जाने की बात की, लेकिन उन्होंने मुझे डाँटा। मैं तब २३ साल का था और मेरी कोई विशेष शैक्षणिक योग्यता नहीं थी। मैंने बाबा से कहा — “मुझे कुछ कमाना है।” बाबा ने कहा — “तू बाबा को छोड़ नहीं सकता। बाबा भी बेगैर हैं। तू किसी से मदद नहीं माँगेगा। ऐसा काम कर जिसमें लेने-देने वाले दोनों की उन्नति हो। कभी झूठ बोलकर कपट मत करना।” फिर जसलोक हॉस्पिटल वालों ने बुलाया, फिर मुझे सिंगापुर भेजा गया, लेकिन मैं तीन महीने में वापस लौट आया। बाबा के प्रति लगाव इतना था कि मैं साल में ५–६ बार बाबा से मिलने आता। एक जौहरी के पास गया और कहा — “मुझे एक्सपोर्ट का काम करना है।” बोला — “मेरे पास तो ₹५ भी नहीं हैं।” लेकिन बाबा ने मुझे सफलता का वरदान दिया था। उस जौहरी ने मुझे ₹५००० का माल दिया। मैंने श्रीलंका में उसे ₹१२,५०० में बेचा। श्रीलंका से माल भारत में बेचकर व्यवसाय बढ़ाया — और जो भी लाभ हुआ, वह सब बाबा को अर्पण करता गया। मेरा बेटा मनोज कुमार है। बेटी ने शादी की है, उसका एक बेटा है और वे पुणे में रहते हैं। बेटी का नाम रेशमा है। अब मैंने वानप्रस्थ जीवन अपना लिया है। अलौकिक और लौकिक परिवार — दोनों में संतुलन बनाए रखा है।