

याद ऐसी हो कि खाद निकल जाए। योग-अग्नि से ही विकर्मों का विनाश होता है—याद माना स्वाहा करना। पारस के संग से लोहा बदलते-बदलते सोना बन जाता है। यदि जरा-सी भी खाद रह जाए, तो स्वयं को भी और औरों को भी डाउट होता है—पता नहीं कितनी मिक्सचर है। जब सारी खाद निकल जाती है, तब अनुभव होता है कि अभी तो सच्चा सोना है। अंतर्मुखता ऐसी हो कि बाह्यमुखता में आने पर भी अंतर्मुख ही रहें तो — हर्षितमुख और आकर्षणमूर्त बन जाएंगे। ईश्वरीय आकर्षण स्वतः हर्षितमुख बना देता है। अंतर्मुखता स्वयं को भी औरों को भी नकारात्मक व दुनियावी वायुमंडल से सुरक्षित रखती है। ऐसे ईश्वरीय और शक्तिशाली वायुमंडल में न कोई विकर्म कर सकता है, न कोई विकल्प आ सकता है। पहले हम अंतर्मुखता में रहते थे बाह्यमुखता से छूटने के लिए। अब हम अंतर्मुखी रहते हैं बाह्यमुख में निमित्त बनने के लिए। जितना बाबा के एक-एक मीठे बोल को अंदर ही अंदर स्मृति में लाते हैं, उतनी ही नवीनता स्वयं में आती जाती है। या स्मृति रहे, कितना ऊँचा पार्ट है हमारा! भगवान थोड़े समय के लिए आए हैं—और वो भी हमारे लिए। बाबा को सच्चे सेवाधारी ब्राह्मण चाहिए। हम निमित्त हैं—कराने वाला तो बाबा है। इस यज्ञ में एक-एक ब्राह्मण की अंगुली और एकता से बहुत बल मिलता है। पहले बाबा की याद से खाद निकालकर स्वयं को साफ करना है, फिर सच्चा बनना है। याद सफाई करती है और सच्चाई प्रत्यक्ष करती है। सच्चाई से ही धारणाएँ हैं, और धारणाएँ ही प्रमाण देती हैं कि—ये सच्चा है। बाबा कहते हैं कि—नेचुरल नेचर ऐसी हो कि बाबा से जो हमें प्राप्तियाँ हुई हैं, वह दूसरों को सहज रूप से मिलती रहें। समयानुसार बाबा को याद करते-करते दुनिया के सामने बाबा स्वयं प्रत्यक्ष हो जाए।