

िवाली हमारी ही यादगार है, इसलिए हमें विशेष खुशी होती है। बाबा इतनी खुशी भर रहे हैं कि पहले हैप्पी होते हैं, तभी हेल्दी और वेल्थी बनते हैं। दिवाली पर पुराना चोपड़ा समाप्त कर नया संकल्प रखना है। संगमयुग पर याद में रहने का पुरुषार्थ करना है। हमारी याद इतनी पक्की हो कि अंतिम समय भी बाबा की याद में ही शरीर छूटे। याद में बैठने पर सेवा का ख्याल आ सकता है, पर जब याद में ही सेवा समाई हो तो वह याद ठहरती है। अंदर से क्लीन बनने पर बाबा की याद पक्की होती है और बुद्धि अर्जुन समान बनती है। अलबेलेपन और मोह के कारण याद का महत्व नहीं समझ पाते, इसलिए बुद्धि भी इधर-उधर भटक जाती है। बाबा की बेफिक्र याद में रहने वालों का पुरस्कार विजय मणके में आना है—8 की माला वाले हर बात में स्वयं को पकड़ने वाले पूजन योग्य होते हैं, 108 की माला वाले निश्चय में अटल होकर विजय का अनुभव करने वाले गायन योग्य होते हैं, और 16108 की माला वाले सच्चे स्नेही व सहयोगी होकर सिमरन योग्य बनते हैं। बाबा ने ज्ञान, गुण, खुशी, शक्तियाँ और पवित्रता के खजाने दिए हैं, पर सबसे बड़ा खजाना संगमयुग का समय है, क्योंकि इसी समय श्रेष्ठ कर्मों की कलम से पूरे कल्प की तकदीर लिखी जाती है। “सच्चे दिल पर साहेब राजी”—इसलिए अपने पर इतना ध्यान रखना है कि परमात्मा के साथ-साथ सब हमसे राज़ी रहें। रास्ता गाइड दिखाता है, चलना मुझे है। लेकिन बाबा साथ भी ले चलते हैं—यह कितना वंडरफुल है। अशरीरी बन बाप को याद करने से विकर्म विनाश होते हैं। कभी-कभी देह-अभिमान इतना पकड़ लेता है कि देह से न्यारे बनकर बीती बात समाप्त नहीं कर पाते। माया के तूफानों से अपवित्रता आती है, इसलिए पवित्रता पर पूरा ध्यान रहे, अपवित्रता का नाम-निशान न रहे।