

बापदादा के घर में शक्तिशाली वायुमंडल का अनुभव होता है। यहाँ योग स्वतः लग जाता है — जैसे साइंस के साधन गर्मी का प्रभाव मिटा देते हैं। हमारी साइलेंस की शक्ति भी ऐसे है; इसे हमें सही तरह से यूज़ करना है। बाबा ने कहा — मैं जैसा हूँ, वैसे पहचानकर चलो। चार स्टेज — पहचानना, सुनना, समझना, मानना। “बाबा-बाबा” नहीं कहना है लेकिन मन-वचन-कर्म और संबंध-संपर्क की शुद्धता भी आवश्यक है। हर विघ्न मन से शुरू होता है। आज नेगेटिव और व्यर्थ संकल्प तेज हैं, इसलिए मन पर अटेंशन जरूरी है। मन से हारे हार, मन से जीते जीत — इसलिए निरंतर योगी बनो। ब्राह्मण संग में अवस्था सहज अच्छी रहती है। कामकाज, अज्ञानी संग या दूषित वातावरण में बीजरूप अवस्था कठिन लग सकती है। ऐसे समय स्मृति रखें — मैं आत्मा करावनहार हूँ, कर्मेंद्रियाँ करनहार हैं। स्वमान रहे — हम परमात्मा के बच्चे, श्रेष्ठ आत्माएँ, हीरो-एक्टर हैं। दिन में पाँच बार ट्रैफिक कंट्रोल रखा है। अगर कामकाज करते हुए अटेंशन रखते है, तो बाबा की याद निरंतर रह सकती है। खाना खाने से पहले भोग लगाएँ। इस प्रकार बार-बार अटेंशन, स्व-चेकिंग और चेंज से चलते-फिरते योग सहज हो जाता है। बाबा कहते हैं — मदद मेरी, मेहनत बच्चों की। जो करेगा वही पाएगा। बच्चों का एक कदम हिम्मत का— हजार कदम मदद बाप की। बाबा को दिल से याद करो तो बाबा हाज़िर है। बाबा अव्यक्त होने पर भी सेवा का निरंतर बढ़ना — यह बाबा की कमाल है। मुरली श्रीमत से सुनें, मनमत मिक्स न हो। व्यर्थ का द्वार है — क्यों, क्या, कैसे, कौन, कब। “व्हाई नहीं, फ्लाई।” होली हंस बनें — स्वयं को देखें, माया से बचें। यह विश्वविद्यालय है जहाँ शिव बाबा राज्य और धर्म दोनों की स्थापना करते हैं। हमारा पेपर — लौकिक और अलौकिक परिवार; इसमें पास होना है। स्वयं को देखना है, दूसरों को नहीं; खेल समझकर हल्के रहना है। अवस्था डगमगाए तो मन-रूपी विमान में उड़ जाएँ : स्विच — मेरा बाबा, पंख — हिम्मत, उमंग-उत्साह, पेट्रोल — ज्ञान और योग का।