

ओम शांति का महामंत्र ही हमें अपने सुखधाम की स्मृति दिलाता है। जब हम योग में बैठते हैं, तो एक ही शुद्ध संकल्प होना चाहिए – "मैं शुद्ध आत्मा हूँ"। जब हमें यह स्मृति रहती है, तो अन्य कोई भी इधर-उधर के संकल्प नहीं चलते। शरीर में रहते हुए योग में रहना हैं; और उस समय स्वयं को न्यारा (अर्थात् मैं इस शरीर से अलग शुद्ध आत्मा हूँ) अनुभव करने से आनंद की अनुभूति होती है। और जब यह अभ्यास और अनुभव पक्का हो जाता है, तो शुद्ध संकल्प, खुशी और साइलेंस की शक्ति जमा होती है। तब स्वयं अनुभव होता है कि मैंने इस शरीर को धारण किया हुआ है , मैं इसमें विराजमान हूँ, मैं शरीर की मालिक हूँ, परन्तु उससे न्यारी हूँ। और जो जितना न्यारा है, वही बाप का उतना ही प्यारा है। यदि हम इस बात को अपने अंदर पक्का कर लेते हैं, तो हमारे अंदर की शुद्धता हमें बाप की ओर खींचती है। (आत्मा से जितनी-जितनी कट निकलती जाती है, उतनी ही वह बाप की ओर खिंचती जाती है।) जितना अभ्यास बढ़ता है, उतना ही बार-बार संकल्प करने की आवश्यकता नहीं रहती। जब हम नियमित अभ्यास करते रहते हैं, तो उसका परिणाम स्वयं ही अच्छे अनुभव के रूप में सामने आता रहता है।