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"(दादीजी निस्वार्थ प्यार और निश्चिंतता की मूर्त थी इतनी बड़ी कारोबार संभालते हुए भी उनसे छोटे से बच्चे की भासना आती थी उनके लिए परमात्म प्यार से अधिक महत्त्व पूर्ण कुछ नही था उनका एक ही लक्ष्य रहता था मानव मात्र को ईश्वर से कैसे जोड़ा जाय वे इतनी बडी कारोबार संभालते हुए भी ईश्वर के घरमें एक छोटे से बच्चे की भांति निश्चित एक खिले हुए फूल की तरह हर्षित रहती थी उनकी एक नजर पड़ते ही असीम सुख और शांति की अनुभूति होती थी ऐसा लगता था मानो दादीजी ने अंतर्मन को ही छू लिया हो और उसे परम आनंद की चरम सीमा तक पहुंचा दिया हो ऐसा लगता था भगवान ने सर्व के भाग्य की रेखा खींचने की कलम उनके हाथ में ही दे दी हो ऐसी जग कल्याणी विश्व उद्धारिणी मीठी दादीमां को शत शत नमन है शत शत नमन है शत शत नमन है) आबू की वादिया ये पर्वत की श्रृंखलाएं बहते पवन है कहते ये वृक्ष और लताएं सेवाए याद आए सेवाए याद आए कही चारो धाम हमको शत शत प्रणाम तुमको दादी प्रणाम तुमको दिन हो पिताश्री का मातेश्वरी का चाहे भूली कभी ना दादी है हम गए भुलाए सम्मान प्यार पाए सम्मान प्यार पाए वो कैसे हम भुलाए शत शत प्रणाम तुमको दादी प्रणाम तुमको कर दिया इस जगत में आबू का नाम बाला दादी प्रकाशमणि के प्रकाश का उजाला हम धन्यवाद करते हम धन्यवाद करते धन्य धन्य खुदको पाए शत शत प्रणाम तुमको दादी प्रणाम तुमको जितनी महान थी तुम उतना विनम्र देखा चिंता मिटाने वाली निश्चित तुमको देखा रेखाएं भाग्य वाली रेखाएं भाग्य वाली तुम्हे देख बढ़ती जाए शत शत प्रणाम तुमको दादी प्रणाम तुमको दिखलाए दैवी दुनिया दिल आपका था दर्पण हम सच्चे मन से करते श्रद्धा सुमन समर्पण है काश संग जो बीते है काश संग जो बीते दिन फिर से लौट आए शत शत प्रणाम तुमको दादी प्रणाम तुमको शत शत प्रणाम तुमको दादी प्रणाम तुमको"