श्रेष्ठ जीवन के लिए हर व्यक्ति में तीन बातें दिखाई देनी चाहिए—गुण, कर्म और स्वभाव। यही तीनों ब्रह्माकुमारियों के जीवन में झलकने चाहिए। हमारा लक्ष्य देवता बनना है, जो सर्वगुण सम्पन्न होते हैं।
“ब्रह्म से ब्रह्मा पधारे” — इसी प्रकार ब्रह्माकुमारियों को भी याद रखना चाहिए कि हमारा नया अलौकिक जन्म हुआ है। इसलिए जीवन में नवीनता आए, कर्म लौकिक से अलौकिक बनें, और बुद्धि में सदा रहे कि हम परमधाम से आई आत्माएँ हैं।
निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी : ब्रह्मा बाबा ने अंतिम समय यही संदेश दिया; निराकारी – मैं आत्मा हूँ, देह नहीं। निर्विकारी – पवित्र और श्रेष्ठ जीवन। निरहंकारी – विनम्र और अहंकार रहित अवस्था।
जब हम स्वयं को लाइट स्वरूप आत्मा समझते हैं, तब निराकारी स्थिति सहज बनती है।
ऊँचे कुल की मर्यादा : हम प्रजापिता ब्रह्मा की संतान हैं, इसलिए हमारा कुल ऊँचा है। भगवान ने हमें ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारी का श्रेष्ठ टाइटल दिया है। यह सम्मान के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी है।
पवित्रता का प्रभाव : बाबा कहते हैं कि एक कुमारी 21 कुलों को तार सकती है। इसका अर्थ है कि उसका जीवन इतना पवित्र, शक्तिशाली और दिव्यगुणों से भरपूर हो कि उसका प्रभाव दूसरों पर पड़े।ऐसी पवित्रता हो कि कैसा भी व्यक्ति सामने आये तो उसे देवी रूप ही दिखे। यही ब्रह्माकुमारी की स्थिति है।
ज्ञान बाँटना भी आवश्यक : बाबा ने जो ज्ञान धन दिया है, उसे रोज किसी न किसी को सुनाना चाहिए। दृढ़ निश्चय हो तो बाबा स्वयं सेवा के साधन बना देते हैं।
आदर्श ब्रह्माकुमारी वह है, जिसके जीवन में गुण, पवित्रता, सेवा, योग और विनम्रता साथ-साथ हों। ऐसा जीवन ही दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है।
