लोग मानते हैं कि वे स्वयं ही पूज्य हैं और स्वयं ही पुजारी हैं। लेकिन परमात्मा तो एवर प्योर (सदा पवित्र) हैं, ग्रहण आत्मा को लगता है। इस ग्रहण या कट को उतारने और साफ करने के लिए योग रूपी घासलेट चाहिए। जब हम विकारों का दान देंगे, तब यह ग्रहण छूट जाएगा।
इस पढ़ाई से हम मनुष्य से देवता बन जाते हैं। यही इस पढ़ाई का स्टेटस है। और वहाँ (सतयुगी दुनिया) हमारी स्थिति होगी — एवर हेल्दी, एवर वेल्दी और एवर हैप्पी।
जो संगमयुग पर पवित्रता की नींव (फाउंडेशन) डालते हैं, उन्हें ब्राह्मण कहा जाता है, और वही आगे चलकर देवता बनते हैं। किसी के भाव या स्वभाव से प्रभावित होकर स्वयं विकर्म नहीं करना है। हमें अचल और अडोल रहना है। अचल और अडोल अवस्था हमारी क्वालिफिकेशन है। इसी का यादगार भक्ति मार्ग में अचलघर के रूप में दिखाया गया है।
किसी और की वजह से हम अपनी खुशी और स्थिरता क्यों छोड़ें? हमें स्वयं को बहुत संभालना है और सावधान रहना है कि हमसे कोई भी विकर्म न हो। विकर्मों के कारण ही हम दुखी हुए हैं।
अपने आपको ऊँचाइयों तक ले जाना है और ऐसी श्रेष्ठ जीवनशैली बनानी है।
