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अपने कर्म ही मानव को ताज तख्त दिलाए बिना किए ना कोई फल मिलता किया व्यर्थ ना जाए जो पुरुषार्थी कर्म से उच्च श्रेष्ठ बन जाता है उच्च श्रेष्ठ बन जाता है जो पुरुषार्थी कर्म से उच्च श्रेष्ठ बन जाता है उच्च श्रेष्ठ बन जाता है बिन मांगे उसे मोती मिलते बिन मांगे उसे मोती मिलते वो सदा मुस्कुराता है उच्च श्रेष्ठ बन जाता है उच्च श्रेष्ठ बन जाता है दुवाएं बनकर जग की सेवा हार गलेका बन जाए तपस्या ताज बनकर जगमे शान और मान बढ़ाए त्याग सभी राज्य बनकर सुख आनंद लुटाता है उच्च श्रेष्ठ बन जाता है उच्च श्रेष्ठ बन जाता है गुणों का दान ही भाग्य बनकर हर संपति ले आता है कर्म ही राज्य तिलक बन ये ललाट सजाता है उसका तीव्र पुरुषार्थ ही उसका तीव्र पुरुषार्थ ही उच्च श्रेष्ठ बन जाता है उच्च श्रेष्ठ बन जाता है जो पुरुषार्थी कर्म से उच्च श्रेष्ठ बन जाता है बिन मांगे उसे मोती मिलते बिन मांगे उसे मोती मिलते वो सदा मुस्कुराता है उच्च श्रेष्ठ बन जाता है उच्च श्रेष्ठ बन जाता है