क्या हमारी विशेषता ही कभी हमारी कमजोरी बन सकती है? और अपनी विशेषता से भाग्य कैसे बनाया जाए?
बाबा कहते हैं—हर ब्राह्मण आत्मा में अनेक विशेषताएँ हैं और एक खास विशेषता भी। किसी में ज्ञान, किसी में योग, दिव्य गुण या सेवा की विशेषता होती है। चारों सब्जेक्ट में बैलेंस हो तो विशेषता प्रभावशाली बनती है।
अपनी विशेषता को बढ़ाने के साथ दूसरों की विशेषता देखना भी सीखें। बड़ी मंज़िल पानी है तो छोटी बातों को इग्नोर करना होगा।
बार-बार अपनी या दूसरों की कमजोरी को याद करना, जैसे मन में उसी की माला फेरना है। गलती से सीखें, लेकिन उसका चिंतन न करें। अपना अटेंशन स्वयं पर रखें।
विशेषता से अभिमान भी आ सकता है, इसलिए हर विशेषता को निमित्त भाव से यज्ञ सेवा में लगाएँ। सेवा में ‘ना’ नहीं—अपनी विशेषता को खुलकर प्रयोग करें।
विशेषता तेज़ चाकू जैसी है—सही तरह प्रयोग करें तो काम आसान, लापरवाही करें तो चोट भी लग सकती है। इसलिए नम्रता और निमित्त भाव से विशेषता का प्रयोग करें।
दूसरों की विशेषता देखकर ईर्ष्या या तुलना नहीं। न स्वयं को कम समझें, न दूसरों को कम आँकें।
सार: हर ब्राह्मण में विशेषता है। चारों सब्जेक्ट का बैलेंस, निमित्त भाव और सेवा में विशेषता का सही प्रयोग—यही भाग्य बनाने का सुंदर रास्ता है।
