हमारा मुख्य पुरुषार्थ है अपनी वृत्ति को बदलना। वृत्ति को एक शिवबाबा में लगाकर प्रेम स्वरूप बनाना ही सच्चा योग है। ज्ञान बताता है कि हमारी वृत्ति पतित बन गई है, जिसे आत्मिक स्वरूप में स्थित होकर शुद्ध करना है। दिव्य गुणों की धारणा से दैवी वृत्ति बनती है।
वृत्ति को शुद्ध और पवित्र बनाने के लिए उसमें रूहानियत, रहमदिलता, स्नेह, सेवा भाव, कल्याण भावना और निमित्त भाव होना चाहिए। क्रोध, द्वेष और नफरत से दूर रहना है।
अव्यक्त स्थिति के लिए विदेही अवस्था जरूरी है—देह में रहते हुए देह से न्यारे बनना। सदा यह निश्चय रहे कि मैं फरिश्ता हूँ, गिरती कला समाप्त हो चुकी है।
विकर्म विनाशक अवस्था के लिए तपस्या आवश्यक है। किसी देहधारी में लगाव न हो। एक बाप दूसरा न कोई—ऐसी अव्यभिचारी याद रखनी है। स्वयं पावरहाउस बनकर दूसरों को शक्ति देनी है।
चिंता छोड़कर एक बाबा के चिंतन में रहना ही बेफिक्र बादशाही है।
वैराग्य अवस्था के लिए मन में यह पक्का हो कि मुझे सब कुछ मिल चुका है। “मेरा तो एक बाबा, दूसरा न कोई।” पुरानी दुनिया से वैराग्य होने पर ही योग सहज लगता है।
नम्रता हमारा अमोघ शास्त्र है। स्वयं को वर्ल्ड सर्वेंट, मरजीवा और फकीर समझकर निरहंकारी भाव से सेवा करनी है।
स्वयं की और दूसरों की विशेषता देखनी है, ईर्ष्या नहीं करनी है। अपने उन्नति के प्लान बनाना, समय, धन और शक्ति का सही उपयोग करना, नवीनता रखना और विशाल बुद्धि से कार्य करना—यही अव्यक्त जीवन की पहचान है।
हम विजयी आत्माएँ हैं। विजय हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। इन सबका आधार है संकल्प। संकल्प से सृष्टि बनती है, पुराने संस्कार समाप्त होते हैं, और लक्ष्य व लक्षण के बीच का अंतर भरता है।
