

ओम शांति के इस महामंत्र द्वारा सदा स्मृति स्वरूप रहना है — स्वयं की, बाबा की और अपने घर की स्मृति। यह स्मृति हमें वर्तमान वायुमंडल से ऊपर रखती है। हमें अपने शुद्ध वाइब्रेशन को संगठन के बीज फैलाने हैं। पुरानी दुनिया में रहते हुए नई दुनिया का अनुभव करना है। बाबा ने हम बच्चों में जो शक्ति जगाई है, उससे नई दुनिया की स्थापना होती है। नई दुनिया में सभी आत्माएँ पवित्र होंगी। वहाँ विकार, पाप, भ्रष्टाचार आदि नहीं होंगे। बाबा ने हमें सत्य और सदाचार की स्थापना का कार्य दिया है। कर्मों के पुराने खाते को समाप्त करने के लिए योग-अग्नि जगानी है। बाप की याद कभी नहीं भूलनी है। मन भटके तो समझो पुरानी दुनिया याद आ रही है। आत्मा का मूल स्वरूप शुद्ध, शांत और पवित्र है। जब धर्म की ग्लानि बढ़ी, तब बाबा ने हमें दुखों से मुक्त करने का संकल्प लिया और ज्ञान यज्ञ रचा, जिससे नई दुनिया की रचना होती है। हमें सदा खुशी में रहना है। “स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन” — इस सिद्धांत पर चलना है। अपने संकल्प को शुद्ध और दृढ़ रखना है। “निश्चय बुद्धि विजयन्ती” — बाबा ने हमें स्वर्ग की स्थापना के लिए निमित्त बनाया है। ज्ञान-रत्न का खजाना दिया है, जिसका चिंतन हमारी बुद्धि को शुद्ध बनाता है। एक बल, एक भरोसा — इससे कुछ भी असंभव नहीं। अपने से बात करें — “मैं शक्तिशाली आत्मा हूँ।” पुराने संस्कारों को समाप्त कर दृढ़ विश्वास रखें — “मैं सर्वशक्तिमान की संतान हूँ।” हम निमित्त बनकर नई दुनिया की स्थापना का कार्य प्रत्यक्ष रूप में लोगों के सामने रख सकते हैं — अपने कर्तव्य से, अपने जीवन से, अपने श्रेष्ठ गुणों से। यही सृष्टि परिवर्तन का आधार है। हम बाबा के डायरेक्शन अनुसार जो कर रहे हैं, वही सत्य है और वही होना है। बाप से मिले हुए खजाने का चिंतन करते रहना है। चैतन्य मूर्ति बनना है।