हम जानते हैं कि सत् बाप, सत् टीचर और सत् सद्गुरु एक ही परमात्मा हैं। बाकी सभी बाप, शिक्षक और गुरु जन्म-मरण के चक्र में आते हैं, इसलिए उन्हें सत् नहीं कहा जा सकता। वही परमात्मा सबका पिता, शिक्षकों का शिक्षक और गुरुओं का गुरु है। संसार भी मानता है कि परमात्मा एक है।
अब जब वह एक परमात्मा हमें मिल गया है, तो इस सौभाग्य का नशा और खुशी सदा बनी रहनी चाहिए। यह पढ़ाई हमें ऊँची स्थिति और श्रेष्ठ भाग्य देती है। यदि अभी यह अवसर खो दिया, तो सदा के लिए खो जाएगा।
परमात्मा स्वयं कहते हैं, "बच्चे, मैं आया हूँ, जो लेना है ले लो।" लेकिन यह प्राप्ति पुरुषार्थ और कर्मों के आधार पर होती है। इसलिए समय निकालकर ज्ञान और योग में नियमित रहना आवश्यक है। जो जितना पुरुषार्थ करेगा, उतना पाएगा।
परमपिता परमात्मा स्वयं आकर शिक्षा दे रहे हैं। इसलिए उनके साथ किसी भी प्रकार की गफलत नहीं करनी चाहिए। वे हमें नई दुनिया के योग्य बनाने के लिए स्थापना, पालना और विनाश का महान कार्य कर रहे हैं।
हमें अपने पुराने संस्कारों को समाप्त कर हर कर्म संभलकर करना है। ज्ञान और योग की शक्ति से संकल्प और कर्म दोनों श्रेष्ठ बनते हैं। भले लौकिक कार्य करते रहें, लेकिन बुद्धि का योग बाबा के साथ जुड़ा रहे।
यह हमारा अंतिम जन्म है, इसलिए कर्मों की गहन गति को समझते हुए सदा ज्ञान और योग का आंतरिक पुरुषार्थ करते रहना है। बाप कहते हैं, "मेरी याद में रहो, मेरे बनकर रहो और ट्रस्टी बनकर रहो।"
जैसे शरीर को भोजन की आवश्यकता होती है, वैसे ही आत्मा को शक्ति प्राप्त करने के लिए ज्ञान और योग की खुराक चाहिए। इसलिए समय निकालकर आत्मा को शक्तिशाली बनाना है।
निराकार बाप हमारे लिए आया है, इसी खुशी में रहकर पवित्र और रॉयल जीवन जीना है। पवित्रता ही सच्ची रॉयल्टी है। पुरुषार्थ करके हमें अपना स्वराज्य-अधिकार प्राप्त करना है।
