

दादीजी बाबा के बच्चों को वैजयंती माला में आने की विधि समझा रही थीं। उन्होंने बताया कि सबसे पहले श्रीमत बापदादा की यह है कि बाहरमुखता को छोड़कर अंतर्मुखी बनो। जब हम अंतर्मुखी होते हैं, तो हमारी देही-अभिमानी स्थिति मजबूत होती है। दादीजी ने कहा कि स्नेह और प्रीत बुद्धि से बाबा के गले का हार बनो, क्योंकि यही लगन हमें याद में स्थिर रखती है। उन्होंने आगे समझाया कि जब हम स्वदर्शन चक्र फिराते हैं, तो उससे हमारे विकार कटते हैं और साथ ही आत्मिक कमाई भी होती है। वैजयंती माला में आने के लिए दो मुख्य गुण आवश्यक हैं — प्रीत-बुद्धि और दिव्य व्यवहार (Divine manners)। दादीजी ने यह भी बताया कि सुस्ती, गफलत और अलबेलापन — ये तीनों ही आत्मिक प्रगति में बाधक और नुकसानदायक हैं। इसलिए जो माला में आते हैं, उन्हें श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करना चाहिए — प्रथम, द्वितीय या तृतीय क्रम में। निरंतर योगी, श्रेष्ठ योगी और सहज योगी बनना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि बाप सदा मदद करता है — “हिम्मत बच्चे, मदद बाप।” इसलिए सच्चाई से भगवान को राज़ी रखना है। हमें यह निश्चय रखना है कि हम बदलेंगे, बदला नहीं लेंगे — कभी नहीं; ऐसे शुद्ध और दिव्य बनना है। अंत में दादीजी ने कहा कि यदि हम बाबा के वचनों को अपनी बुद्धि-रूपी झोली में सुरक्षित रखें, तो हम देवता बन सकते हैं। बाबा की आशा हमारी तीव्र इच्छा और समय की बलिहारी बन जाती है।