स्वयं परमपिता परमात्मा हमें अपना परिचय देकर, संग के रंग से जीवन को श्रेष्ठ बनाने का प्रैक्टिकल रास्ता बताते हैं। ऐसा भाग्य केवल संगमयुग पर ही प्राप्त होता है।
जो अपने श्रेष्ठ लक्ष्य को पाने की हिम्मत और उमंग-उत्साह रखते हैं, उन्हें बाबा की मदद अवश्य मिलती है। ईश्वरीय परिवार होने के कारण संगठन का बल भी प्राप्त होता है।
परमात्मा के कार्य में सहयोगी बनना हमारे लिए सबसे बड़ा सौभाग्य है। हमें स्वयं को ऐसा योग्य बनाना है कि बाबा के कार्य को सफल कर सकें। नशा रहे कि हम ब्राह्मण खानदान के हैं, हमारा जीवन हीरे तुल्य है और इस समय स्वयं परमात्मा के सम्मुख हैं।
बाबा ने हमें नूरे रत्न, स्वदर्शन चक्रधारी जैसे श्रेष्ठ स्वमान दिए हैं। यह ईश्वरीय ज्ञान केवल संगमयुग पर ब्राह्मण जीवन में ही प्राप्त होता है। बाबा का हर बच्चा असाधारण है।
बाबा की याद में बैठकर हम वातावरण और प्रकृति के पाँचों तत्वों को शुद्ध करने में सहयोग देते हैं। कलियुगी गोवर्धन पर्वत को उठाने में अपनी उंगली देकर, विश्व-कल्याण के कार्य में सहयोगी बनते हैं।
हमें ज्ञान, योग और विचार-सागर मंथन से स्वयं को भरपूर करना है और श्रेष्ठ कर्मों के बीज अभी ही बोने हैं। बाबा के राइट हैंड बनकर सहयोग देंगे तो विश्व की बादशाही के अधिकारी बनेंगे।
