सच्चा ब्रह्माचारी वह है जो मनसा, वाचा और कर्मणा ब्रह्मा बाबा के कदमों पर कदम रखता है। हम ब्रह्मा बाबा के बच्चे, उनकी शक्तियों के वारिस और उनकी वसीयत के अधिकारी हैं। अपने ब्राह्मण स्वरूप का नशा ही सच्ची खुशी और अतीन्द्रिय सुख का आधार है। चढ़ती कला का अर्थ है सदा उमंग, उत्साह और खुशी में रहना। हिम्मत रखने वालों की बाबा स्वयं मदद करते हैं।
स्व-उन्नति के लिए अपने उमंग-उत्साह की जाँच करें, नियमित चार्ट लिखें और सदा सजग रहें। हम गॉडली स्टूडेंट हैं, जिन्हें स्वयं परमात्मा पढ़ा रहे हैं। हमारा लक्ष्य केवल पास होना नहीं, बल्कि पास विद ऑनर और स्कॉलरशिप प्राप्त करना है। संकल्प, वाणी और कर्म ज्ञानमय हों तथा ऐसा कोई कर्म न हो, जिससे सज़ा का अनुभव करना पड़े। बाबा की शक्तियों का हाथ हमारे साथ है, इसलिए कभी निराश न हों।
उमंग-उत्साह का आधार स्वयं पर और बाबा पर दृढ़ विश्वास है। संगठन हमारी शक्ति है। सहयोग देना और लेना ही सफलता का मार्ग है। मन को व्यर्थ विचारों से हटाकर बाबा की याद, ज्ञान-मनन और सेवा में व्यस्त रखें। जब मन, वाणी और कर्म श्रेष्ठ कार्यों में लगते हैं, तब उमंग-उत्साह बना रहता है।
बाबा की दी हुई शक्तियों को जीवन में धारण करें। योग से शक्ति और शांति का अनुभव करें, बाबा के प्रति सच्चे, साफ़दिल और ईमानदार रहें तथा सबके प्रति शुभभावना और शुभकामना रखें। ईमानदारी ही वरदानों की पात्रता का आधार है।
राजयोगी जीवन का अर्थ है किसी व्यक्ति, विचार, भावना या संस्कार के वश में न होना। पुराने संस्कारों पर विजय प्राप्त करें, कार्य करते हुए भी दिल सदा बाबा के साथ रखें और वृत्ति को ज्ञान-चिंतन में व्यस्त रखें। बाबा की मस्ती में हल्के और प्रसन्न रहकर अपनी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ाएँ तथा दूसरों को भी उसका अनुभव कराएँ। यही अतीन्द्रिय सुख से भरपूर ब्राह्मण जीवन की पहचान है।
