राजयोग के द्वारा हम राजाओं के राजा बनते हैं। ज्ञान अर्थात समझ—अब हमें समझ आया है कि मनुष्य जीवन का सबसे श्रेष्ठ लक्ष्य क्या है।
जिसका बाबा से जिगरी प्यार है, वह सदा स्वयं को भरपूर अनुभव करेगा। जो ज्ञान रत्नों से खेलते रहते हैं, योगबल से पाँच विकारों पर विजय प्राप्त करते हैं और पवित्रता का ताज धारण करते हैं, वे सदा भरपूर रहते हैं। भरपूर आत्माएँ सदा दाता बनती हैं।
बाप-दादा से मिलन मनाना—सारे कल्प और सारे संसार में इससे ऊँची मुलाकात और कोई नहीं। विचार करें, हमारा भाग्य कितना ऊँचा है! जब ऐसी महान आत्माएँ समझ के साथ मिलन मनाती हैं, तो उस मुलाकात का आनंद भी श्रेष्ठ होता है। इस अव्यक्त मुलाकात से स्वयं के जीवन को आदर्श बनाने की उमंग रहती है।
हर प्रकार की सेवा में सहयोगी बनने से हमारे अंदर सर्व कलाएँ आती जाती हैं। दृढ़ निश्चय बुद्धि बनना ही बड़ी रॉयल्टी है। जो बनना है, अपने एम-ऑब्जेक्ट में भी दृढ़ निश्चय बुद्धि बनना है।
अपने आप से पूछें— बाबा हमें इतना ऊँचा बना रहे हैं, तो क्या हमारी धारणाएँ भी इतनी ऊँची हैं? क्या हमारी स्मृति भी इतनी श्रेष्ठ है?
