हम तो बाबा के हो चुके, केवल “होंगे व बनेंगे” नहीं लेकिन हो चुके। सच्चे मन से समर्पण करने पर ही प्राप्ति होती है। पहले स्वयं को बाबा का बच्चा मानकर पवित्रता धारण करें।
ब्राह्मण का मुख्य कर्तव्य है — पढ़ना और पढ़ाना। परमात्मा स्वयं हमें यह ज्ञान देते हैं, जिससे हम नर से नारायण बन सकते हैं। यह सबसे ऊँची पढ़ाई है, जो जीवन को श्रेष्ठ बनाती है।
बाबा की मत पर चलकर विकारों पर विजय पाना है। ज्ञान सुनना और सुनाना भी ब्राह्मण का धर्म है। सेवा करने से उमंग-उत्साह और सच्ची खुशी मिलती है।
अपने अंदर की कमियों — लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार — को पहचानकर समाप्त करना है। मन, वचन और कर्म पर नियंत्रण रखकर बाबा की याद में रहने से विकार नष्ट होते हैं।
स्वदर्शन चक्रधारी बनकर अपने संकल्पों को शुद्ध करना है। शंख — ज्ञान सुनाना, गदा — विकारों का नाश करना, कमल — गृहस्थ में रहकर पवित्र जीवन जीना। हर समय स्वयं को चेक करें — क्या मैं लायक बच्चा हूँ? पुरुषार्थ से ही भाग्य बनता है।
सब आत्माएँ वानप्रस्थ अवस्था में हैं और वापस घर जाना है। जो परमात्मा को पहचानते हैं, वे जीवनमुक्ति पाते हैं, बाकी सबको मुक्ति मिलती है।
