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"चलो मुसाफिर अपने घर, अब तो पूरा हुआ सफर बुला रहा है वतन तुम्हारा, मुख का रुख अब करो उधर दिन वो कितने प्यारे थे, सुख के भरे नजारे थे धरती, अम्बर, चाँद-सितारे, सारे हुए हमारे थे कब आयेंगे दिन फिरकर, याद आते हैं रह-रहकर अब तो पूरा हुआ सफर..... कल तक जो भी था अपना, आज हुआ सारा सपना भूल गये निल घर की राह, पाये दुःख ना जिसकी थाह पग-पग पर खाये ठोकर, चूर हो गये हो थककर अब तो पूरा हुआ सफर.... परमपिता की बाहों में, आओ प्रभु पनाहों में राजयोग की राहों में, शीतल- शीतल छाओं में अगर-मगर की छोड़ डगर, नजर करो ना और किधर अब तो पूरा हुआ सफर...."