बाबा बच्चों के साथ टेनिस, क्रिकेट और बैडमिंटन खेलते थे। मनमोहिनी दीदी के साथ बच्चे घूमने जाते और रास्ते में मुरली की पॉइंट्स रिपीट करते थे।
बाबा कहते थे—“अपनी सारी समस्याएँ मुझे दे दो और तुम हल्के हो जाओ।” हम अनाड़ी थे, फिर भी बाबा को हम पर पूरा विश्वास था। वे काम भी देते और उसे करने की विधि भी बताते। उनके हर डायरेक्शन में शक्ति भरी रहती थी।
बाबा हमें अपने समान बनाने की मेहनत करते थे। रोज़ मुरली में कहते—“मुझे याद करो”, ताकि कोई भी बच्चा अंत समय में फेल न हो।
जैसे हम दिन में तीन बार भोजन करते हैं, वैसे ही मुरली को भी बार-बार पढ़ना और मनन करना है। बाबा हमारे लिए इतनी मेहनत करते हैं, हमें भी आत्मा समझने का पुरुषार्थ करना है।
साकार मुरली सागर की लहरों समान है। चारों सब्जेक्ट—ज्ञान, योग, धारणा और सेवा—से रोज़ नई पॉइंट्स मिलती हैं। उन्हें अलग-अलग नोट करें और सेवा में प्रयोग करें। किसी के प्रश्न का उत्तर देते समय यदि सीधी चर्चा में फँसने की संभावना हो, तो युक्ति से बात को दूसरी पॉइंट पर ले आएँ।
हम स्टूडेंट हैं, इसलिए सेवा का खूब शौक रखना है। सेवा से पुरानी वृत्तियाँ बदलती जाएँगी और बाबा की याद स्वतः आने लगेगी।
हमें सेवा में एक्सपर्ट बनना है, ताकि अपने अनुभवों से दूसरों को भी आगे बढ़ा सकें। सेवा में रहेंगे तो पवित्रता और खुशी भी बढ़ती जाएगी।
मुरली से खुशी, सुख और शांति के खजाने निकालते रहें। स्वयं भी भरपूर बनें और दूसरों में भी ज्ञान-रत्न बाँटने के निमित्त बनें। इससे उदासी दूर हो जाएगी।
एक जगह बैठे नहीं रहना है। सारी दुनिया को ज्ञान सिखाना है। यह हमारा आध्यात्मिक बिजनेस है—कमाई भी करनी है और ग्राहकों को भी जोड़ना है। इसके लिए रमतबाज और युक्तियुक्त बनो।
दुनिया का ज्ञान अलग है और बाबा का ज्ञान नया, बिल्कुल अलग ज्ञान है। पवित्रता तब आती है जब हम स्वयं को आत्मा समझकर चलते हैं। बाबा मुरली द्वारा ज्ञान के साथ शक्ति भी भरते हैं, जिससे हम पवित्रता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं।
हमें ज्ञान को जीवन में प्रयोग करना है और स्वयं को सदा हल्का रखना है। मन पर बोझ होगा तो ज्ञान का सुख समाप्त हो जाएगा। चेहरा सदा खुशनुमा रखो, ताकि जो भी देखे, उसे महसूस हो—“ये इतना खुश कैसे रह सकते हैं?” हमारे पास जो ज्ञान का खजाना है, उसे अपने तक सीमित नहीं रखना है—सभी को ज्ञान-रत्न बाँटने हैं।
