"इंसान का संसार में आदि मध्य अंत होता है
जो कुर्बान करे तन मन धन जन पर वही संत होता है
दादा लेखराज है दादा लेखराज
दादा लेखराज है दादा लेखराज
ब्रम्हा बन बैठे प्रभु जी के साथ
दादा लेखराज है दादा लेखराज
दादा लेखराज है दादा लेखराज
ब्रम्हा बन बैठे प्रभु जी के साथ
प्रभु जी के साथ
इसका देहका धर्म था सिंधी
इसके घर आई ज्योतिबिंदी
बोली देदो दादाजी देह रूपी कर
दादा लेखराज है दादा लेखराज
दादा लेखराज है दादा लेखराज
ब्रम्हा बन बैठे प्रभु जी के साथ
दादा लेखराज है दादा लेखराज
दादा लेखराज है दादा लेखराज
ब्रम्हा बन बैठे प्रभु जी के साथ
प्रभु जी के साथ
प्रभु जी के साथ
ब्रम्हा बाबा हीरे मोती के प्यारी
सिंध पाकिस्तान से ये आई सवारी
ओम ध्वनि लगाए बड़ी प्यारी
ओम राधे बनी ब्रम्हाकुमारी
जनवरी अठारह को उठ गई सवारी
लाए स्वर्ग नरक का संगम संगम
गुलजार हुए प्यारे मोरे शिवम
लाए स्वर्ग नरक का संगम
गुलजार हुए शिवम
आओ ले लो उनसे दृष्टी कर लो दीदार
दादा लेखराज है दादा लेखराज
दादा लेखराज है दादा लेखराज
ब्रम्हा बन बैठे पिया जी के साथ
पिया जी के साथ
पिया जी के साथ
ज्ञान की हमको चढ़ी है खुमारी
स्वर्णिम युग की है तैयारी
महाविनाश की अब है बारी
आत्म घर चलने की तैयारी
दादा लेखराज है दादा लेखराज
दादा लेखराज है दादा लेखराज
ब्रम्हा बन बैठे पिया जी के साथ
पिया जी के साथ
दादा लेखराज है दादा लेखराज
दादा लेखराज है दादा लेखराज
ब्रम्हा बन बैठे पिया जी के साथ
पिया जी के साथ
प्रभु जी के साथ
प्रभु जी के साथ
प्रभु जी के साथ"
