

बापदादा ने कहा है कि हमें सर्वगुण सम्पन्न बनना है, लेकिन साथ ही किसी एक गुण में विशेष (स्पेशलिस्ट) भी बनना है। पूरे ड्रामा में गुणों का ही खेल है; हम लक्ष्मी-नारायण जैसे दिव्य गुणों को धारण करने का पुरुषार्थ कर रहे हैं। बाबा कहते हैं—एक गुण पर विशेष ध्यान दो। जैसे हर जगह थोड़ा-थोड़ा खोदने से पानी नहीं निकलता, लेकिन एक जगह गहराई से खोदने पर पानी मिल जाता है। उसी तरह एक गुण को गहराई से धारण करने पर अन्य गुण भी अपने आप आ जाते हैं। गुण ग्रहण करने का आधार है कर्म सिद्धांत। हर कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता, लेकिन “Karma is its own reward”—अच्छा कर्म करने से आत्मा भीतर से संतुष्टि अनुभव करती है। यदि हम दूसरों से प्रशंसा की अपेक्षा रखते हैं, तो गुण धारण नहीं कर पाते। किसी के व्यवहार से प्रभावित होकर क्रोध या घृणा में आना हमारी कमजोरी है; शांत रहना ही हमारी महानता है। दृढ़ता (Determination) भी बहुत आवश्यक है। बिना दृढ़ता के किसी भी गुण में विशेष नहीं बन सकते। हमें स्वयं ध्रुव तारे और अंगद की तरह अडिग बनना है। संतुष्टता (Contentment) एक मुख्य गुण है। यह तब आता है जब सहनशीलता, शीतलता, प्रेम और कल्याण की भावना हो। एक संतुष्ट आत्मा के अंदर कई गुण स्वतः समाए होते हैं। उत्साह (Enthusiasm) भी जरूरी है। उत्साह के बिना जीवन निष्क्रिय हो जाता है। आत्मिक प्रगति वही करता है जिसमें उत्साह और साहस होता है। सबसे महत्वपूर्ण है—बाबा को सदा सामने रखना। यदि बुद्धि में बाबा के अलावा किसी देहधारी की छवि है, तो संपूर्णता संभव नहीं। क्योंकि सिवाय बाबा के कोई संपूर्ण है ही नहीं। साकार बाबा का कितना बड़ा पुरुषार्थ होगा। उनमें इतने सारे गुण वो एक (शिव बाबा) से जुड़ने से ही उन्हें प्राप्त हुए। मन बुद्धि में केवल बाबा का ही चित्र रखा। चित्र से ही चरित्र बनता है। इसीलिए सबको ज्ञान समझाने के लिए भी हमने चित्र रखे हैं। ऊपर जो सारी बातें बताई उनको धारण करके पहले जनरल डॉक्टर बन जाए, फिर कोई एक गुण का विशेष पुरुषार्थ करके उसमें स्पेशालिस्ट बन जाए।