भगवान बाप के रूप में हमें 21 जन्मों की राजाई देने वाला मिला है। राजयोग की पढ़ाई पढ़ाकर हमारी पालना करना ही उसकी हम पर सबसे बड़ी दुआ है।
बाबा का परिचय और राजयोग की बातें दूसरों तक पहुँचाकर जब हम आत्माओं के कल्याण के निमित्त बनते हैं, तो उनके दिल से निकली दुआएँ हमारा पुण्य का खाता बढ़ाती हैं।
इस ईश्वरीय कार्य में तन, मन, धन और अपनी विशेषताओं को लगाना, दुआओं का बीज बोना है। संगम युग में बाप से मिले श्रेष्ठ संस्कार अंतिम जन्म तक भी काम आते हैं। बाबा की श्रीमत और मुरली हमारे लिए सबसे बड़ी आशीर्वाद हैं।
बाप के सपूत बच्चे बनकर ज्ञान को जीवन में धारण करें तो स्वतः ही सभी के प्रति शुभ भावना और शुभ कामना रहती है। यही दुआएँ लेने का सहज साधन है।
बाबा ने यज्ञ में भावना को सबसे अधिक महत्व दिया है। योगी और त्यागी जीवन, श्रीमत पर चलना और दूसरों का जीवन श्रेष्ठ बनाना—यही हमारा भाग्य बढ़ाता है।
बाबा पर पूरा निश्चय रखकर दिल से समर्पित रहें। बाबा हमारी संभाल के जिम्मेदार हैं। जितना हम निर्माण और निमित्त बनते हैं, उतनी ही दुआएँ प्राप्त होती हैं।
सुबह स्वयं को परमधाम में बाबा के पास बैठाकर शक्तियाँ भरें और उन्हें पूरे विश्व में फैलाएँ। स्वयं का कल्याण, विश्व का कल्याण और पुण्य का खाता बढ़ाना—यही है दुआएँ लेना और दुआएँ देना।
