धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे... कब यह महाभारत हुआ? कब आत्मा ने युद्ध रचा? कब मोह ने मन को बाँधा? कब गीता ज्ञान प्रकट हुआ? किसने यह वाणी सुनी? किसकी यह कहानी? गीता एक अर्जुन ने सुनी — या हर आत्मा में गूँजे ये ध्वनि? क्या यह इतिहास की गाथा थी? या चेतना का संघर्ष था? क्या यह रणभूमि बाहर थी? या भीतर का ही कुरुक्षेत्र था? गीता क्या युद्ध की पुकार है? या शांति की घोषणा? गीता क्या शास्त्र है? या ईश्वर का प्रेम-संदेश? क्यों है, क्यों है... यह गीता हर युग में अमर? क्यों प्यारी है हर दिल को? क्यों जगाती है आत्माओं को आज भी ? सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः। किसने यह कहा? युगों-युगों की यह गाथा न्यारी, अमृत-सी यह वाणी प्यारी। इसमें छुपा है रहस्य अनमोल, ज्ञान के अद्भुत हैं ये बोल। यदा यदा हि धर्म घटे, अधर्म बढ़े जग में, तब तब भगवान प्रगटे ब्रह्मा तन में। ज्ञान की गंगा बहाने, अंधकार मिटाने, सतयुगी-वृक्ष उगाने, सत्य-धर्म जगाने। संसार को प्रेम सिखाने, मन को निर्मल करने, हर हृदय में दीप जलाने, सद्गति का मार्ग दिखाने। मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे। किसने यह कहा? हर शब्द में छुपा उजियारा, हर श्लोक बने जीवन का सहारा। गीता ही शक्ति, गीता ही मुक्ति, गीता ही भक्ति, गीता ही युक्ति। गीता ही ज्ञान, गीता ही विज्ञान, गीता ही निर्वाण, गीता ही प्रमाण। गीता ही धर्म, गीता ही मर्म, गीता ही कर्म, गीता ही वर्म। गीता ही आत्मा का प्रकाश, गीता ही ईश्वर का आभास। गीता ही हृदय का गीत, गीता ही जीवन का संगीत। गीता से आरंभ, गीता से अंत, गीता ही सत्य, गीता ही अनंत।