एक पल ठहरकर सोचिए…
जब हम गुस्सा करते हैं…
किसी अपने पर।
इरादा हमारा
उनकी भलाई होता है…
लेकिन उस क्षण हमारे
विचार क्या होते हैं?
क्या तुमसे कुछ नहीं होता?
तुम हमेशा ऐसे ही हो!
क्या हम महसूस करते हैं…
कि गलती सुधारते-सुधारते
हम व्यक्ति को ही गलत
ठहराने लगते हैं?
और उस क्षण…
हमारे मन का स्नेह
कहाँ खो जाता है?
कभी-कभी हम सोचते हैं…
गुस्सा तो concern है।
अपनों की भलाई के लिए है।
लेकिन क्या अच्छी intention
हमारे हर विचार को
अच्छा बना देती है?
क्योंकि हर thought
एक energy है…
जो सबसे पहले हमें
ही महसूस होती है।
Being Bliss हमें
एक गहरी बात
समझने के लिए
आमंत्रित करता है—
शायद बदलाव की
शुरुआत दूसरों को
बदलने से नहीं…
अपने विचारों की quality
बदलने से होती है।
गलती पर बात करना…
और व्यक्ति को गलत ठहराना…
क्या दोनों एक ही हैं?
तो रुककर सोचिए…
क्या मैं गलती सुधार रहा हूँ…
या अपने गुस्से से अपने
ही स्नेह को रोक रहा हूँ?
