

कल्याणकारी बन कर ले कर्म,रहमदिल बन, सब पर कर ले रहम। आत्माओं की सुनें हम पुकार,दुखी, परेशान है यह संसार। दाता-विधाता की हम संतान,सुख-शांति का दें सभी को दान। निमित्त निर्मान भाव हो,'मैं' और 'मेरे'पन का अभाव हो। निर्मान भाव से होगा नव-निर्माण,निर्मानता ही सर्व गुणों की खान। निर्वाण स्थिति को पाना है,निर्वाण धाम जाना है,सबका है अरमान। तेज करो अपना स्व-पुरुषार्थ,मिट जाए ग़म की अंधियारी रात। शुभ भावना है सूर्य समान,रोशन करेंगे हम सारा जहान। दाता-विधाता की हम संतान,सुख-शांति का दें सभी को दान। हर घड़ी 'वाह-वाह' कहना है,'क्यों-क्या' में न कभी उलझना है। नयनों में बाबा ही हो समाए,दिल में वैराग्य को जगाए। मुक्त सभी को करना है,दुखों से छुड़ाना है,मिला यही फरमान। वैराग्य से खुलेगा मुक्ति का द्वार,मुक्ति दिलाने का यही आधार। रिंचक भी न हो देह का भान,हद की बातों से रहें उपराम। दाता-विधाता की हम संतान, सुख-शांति का दें सभी को दान।