परमपूज्य बाप ने हमें कर्मों की गति का ज्ञान दिया है। कर्म तीन प्रकार के होते हैं— कर्म, अकर्म और विकर्म। आत्मा अपने कर्मों अनुसार हिसाब स्वयं बनाती है और उन्हीं के आधार पर जन्म-जन्मांतर का फल प्राप्त करती है। इसलिए कर्मों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
विकारों के प्रभाव में किए गए कर्म विकर्म बन जाते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, देह-अभिमान तथा व्यर्थ संकल्प भी विकर्म का कारण हैं। परमात्मा की याद और पवित्रता से पाप कर्मों का नाश होता है तथा आत्मा को शक्ति मिलती है।
हर कार्य कर्म है; लेकिन उसे श्रेष्ठ कर्म या विकर्म बनाना हमारे हाथ में है। परमात्मा की याद में रहकर किए गए कर्म अकर्म बन जाते हैं, जिनका बंधन नहीं बनता। सतयुग में भी कर्म अकर्म होते हैं, इसलिए वहाँ कर्मों का खाता नहीं होता।
हमें देह-अभिमान छोड़कर आत्म-अभिमानी बनना है और स्वयं को परमात्मा की संतान समझते हुए सोल कॉन्शियस तथा गॉड कॉन्शियस स्थिति में रहना है। ज्ञान को जीवन में धारण कर, पाँच विकारों से बचकर, हम श्रेष्ठ कर्म जमा कर सकते हैं। इससे श्रेष्ठ भाग्य का निर्माण होता है।
