मुखड़ा :
खजानों के दाता हैं बाबा हमारे।
बाबा से पाए हमने ख़ज़ाने सारे।
खजानों को हम ख़ुद में समाएँ, कार्य में लाएँ, अनुभव बढ़ाएँ।
अंतरा : 1
ज्ञान का खजाना मुक्ति दिलाए, जीवन-मुक्ति का अनुभव कराए।
योग से ही हम शक्तियाँ पाएँ, धारणा ही हमें गुणवान बनाए।
सेवा से मिले दिल की दुआएँ, दुआओं से ख़ुशियाँ बढ़ती जाएँ।
सबसे बड़ा खजाना संगमयुग का समय है।
खजानों को हम ख़ुद में समाएँ, कार्य में लाकर अनुभव बढ़ाएँ।
अंतरा : 2
खजानों के दाता ने दिया बेहद खजाना है।
जितना चाहे जमा कर ले, यही समय सुहाना है।
पुरुषार्थ के बल से ही श्रेष्ठ प्रालब्ध पाना है।
संतुष्ट रहकर ही सबको संतुष्ट करना है।
निमित्त-निर्माण भाव दिल में सबके लिए रखना है।
पुण्य का खाता जमा कर बढ़ाएँ।
खजानों को हम ख़ुद में समाएँ, कार्य में लाकर अनुभव बढ़ाएँ।
अंतरा : 3
बाबा की मुरली है श्रेष्ठ खजाना,
सुनने के साथ-साथ दिल में समाना।
समाने वाले ही भरपूर होंगे, हलचल में भी वे अचल रहेंगे।
चेहरे से ख़ुशक़िस्मत दिखलाएँ, गुलाब के पुष्प सा महकाएँ।
खजानों को जमा कर सब पर लुटाएँ।
खजानों को हम ख़ुद में समाएँ, कार्य में लाकर अनुभव बढ़ाएँ।
