हमारे ज्ञान, योग, धारणा और सेवा — चारों का आधार एक ही शब्द है — “बाबा”। ज्ञान में बाबा, योग में बाबा, धारणा में बाबा समान बनना, और सेवा में भी बाबा की याद — तभी सफलता होती है, नहीं तो मैं-पन आ जाता है।
मुरली सुनना मतलब उसे जीवन में लाना। बात दिमाग से नहीं, दिल से लगनी चाहिए। दिल से “बाबा” निकले तो ज्ञान अविनाशी बनता है और योग सहज लगता है।
जीवन में पेपर आते हैं, लेकिन फेल इसलिए हो जाते हैं क्योंकि बात दिल तक नहीं जाती। जिद्द, ईर्ष्या और भय — ये कमजोरी की निशानी हैं। यह स्लोगन याद रहे — पाप से डरो, पापी से नहीं।
सहन शक्ति रखेंगे तो भय खत्म हो जाएगा और दुआएँ मिलेंगी। व्यर्थ संकल्प से दूर रहना है। जहाँ व्यर्थ है वहाँ समर्थ बाप नहीं ठहरता। दूसरों को नहीं देखना, खुद को संभालना है। कोई गिरे तो हम न गिरें — यही पढ़ाई है।
बीमारी या परिस्थिति में भी मन को खुश रखना है। मन मजबूत होगा तो तन भी ठीक होगा और बाबा की मदद मिलेगी। मम्मा ने कठिन बीमारी में भी खुशी नहीं छोड़ी।
छोटी बात को बड़ा मत बनाओ। बात आई और गई — उसे पकड़कर मत बैठो। पेपर आया है, मुझे पास होना है — यही सोचो। अपनी गलती सुधारनी है , दूसरों की नहीं।
हमने क्या पाया, यह देखो — बाबा मिला, ब्राह्मण जीवन मिला, सेवा मिली — यही सबसे बड़ी खुशी है। कैसी भी परिस्थिति आए, खुशी नहीं छोड़नी है।
बाबा का स्लोगन है — खुश रहो और खुशी बांटो। मन को खुश रखो, बाबा के गुण गाओ, यही सच्चा ब्राह्मण जीवन है।
भोग के बारे में दादी कहतीं कि; बाबा कभी-कभी दादी की स्मृति का स्विच ऑफ कर देते थे। एक बार बाबा ने वतन में इमर्ज किया, वहाँ से सारी सभा साफ-साफ दिखाई दे रही थी, जैसे क्लियर टीवी हो। फिर बाबा ने स्मृति गुम कर दी। थोड़े साइलेंस के बाद बाबा ने कहा — डायरेक्शन भी तो देनी है। फिर बाबा स्वयं आए, कहने से नहीं, अपने समय से आए।
