

"लौट जाऊं मैं रुह बनकर लौट जाऊं मैं रुह बनकर,अब तो अपने वतन इश्क में डूबा नूरे खुदा के, इश्क में डूबा नूरे खुदा के ऐसी लागी लगन, ऐसी लागी लगन लौट जाऊं मैं रुह बनकर .... मैं मोती हूं उस समन्दर का,मैं ज्योती हूं नूर संसार का मैं तो हूं ही खुदा की औलाद,मैं तो हूं ही खुदा की औलाद फिर पहचान में कैसी उलझन, फिर पहचान में कैसी उलझन ऐसी लागी लगन, ऐसी लागी लगन लौट जाऊं मैं रुह बनकर ...... मैं अनजान था कई मुद्दत से, मैं नादान था सच्ची इबादत से मिला इलाही सुख का मंज़र,मिला इलाही सुख का मंज़र फिर टूट गये सारे बन्धन, फिर टूट गये सारे बन्धन ऐसी लागी लगन, ऐसी लागी लगन लौट जाऊं मैं रुह बनकर ........ ये दिल्लगी की मीठी दास्तां, कहती ये ज़मीं कहता आसमां गहरे रिश्ते का सेहरा पहने,गहरे रिश्ते का सेहरा पहने मैं तो हो गया उसपे अर्पण,मैं तो हो गया उसपे अर्पण ऐसी लागी लगन, ऐसी लागी लगन लौट जाऊं मैं रुह बनकर, लौट जाऊं मैं रुह बनकर अब तो अपने वतन इश्क में डूबा नूरे खुदा के, इश्क में डूबा नूरे खुदा के ऐसी लागी लगन, ऐसी लागी लगन ऐसी लागी लगन, ऐसी लागी लगन"