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"मैं फरिश्ता तन का मालिक उड़ चला वतन में मैं फरिश्ता तन का मालिक उड़ चला वतन में पल में आऊ पल में जाऊ पल में आऊ पल में जाऊ तन से दूर गगन में मैं फरिश्ता तन का मालिक उड़ चला वतन में फरिश्तों का नगर है प्रभु का ये आंगन खिले खिले चेहरे है मधुर मधुर सबका मन मधुर मधुर सबका मन शीतल स्नेह छलक रहा है सावन सा इस मन में मैं फरिश्ता तन का मालिक उड़ चला वतन में दिव्यता की रोशनी छाई है चारो तरफ सुनहरी लहरोपर दिखे एक अलौकिक झलक एक अलौकिक झलक अनोखा अनुभव हो रहा है जीवन की सरगम मैं फरिश्ता तन का मालिक उड़ चला वतन में इस मिलन की महफिल में हम है ऐसे मगन है मिलते मन के सितारे भूले हुए है तन भूले हुए है तन जगमग करती आत्म ज्योति भृकुटी के मध्यम मैं फरिश्ता तन का मालिक उड़ चला वतन में मैं फरिश्ता तन का मालिक उड़ चला वतन में पल में आऊ पल में जाऊ पल में आऊ पल में जाऊ तन से दूर गगन में मैं फरिश्ता तन का मालिक उड़ चला वतन में उड़ चला वतन में उड़ चला वतन में ____________________________"