मन ही बंदर, मन ही मदारी,
नाच रही है दुनिया सारी।
मन ही बंधन, मन आज़ादी,
मन ही राजा, मन भिखारी॥
मन ही बंदर, मन ही मदारी,
नाच रही है दुनिया सारी॥
कभी ये दौड़े धन के पीछे,
कभी ये पद की सीढ़ी चढ़ता।
कभी प्रशंसा सुनकर फूले,
निंदा सुनते ही है लड़ता।
इच्छाओं की डुगडुगी बजती,
नाचे मन की होशियारी।
मन ही बंदर, मन ही मदारी,
नाच रही है दुनिया सारी॥
कल की गठरी सिर पर रखकर,
आने वाले कल से डरता।
जो पल सम्मुख खड़ा हुआ है,
उसमें भी ये कहाँ ठहरता।
यादों की रस्सी पर चलता,
आशाओं की करे सवारी।
मन ही बंदर, मन ही मदारी,
नाच रही है दुनिया सारी॥
कभी किसी से प्रेम जताता,
कभी किसी से बैर बनाता।
अपना-पराया जाल बिछाकर,
खुद ही उसमें फँसता जाता।
खुद ही अपनी धुन बजाता,
खुद ही करता नाच की तैयारी।
मन ही बंदर, मन ही मदारी,
नाच रही है दुनिया सारी॥
एक घड़ी बस मौन में बैठो,
बंदर का ये नाच निहारो।
न उसे दबाओ, न समझाओ,
साक्षी बन बस उसे निहारो।
जिस दिन आत्मा जाग उठेगी,
छूटेगी मन की सरदारी।
मन ही बंदर, मन ही मदारी,
नाच रही है दुनिया सारी।
मन ही बंधन, मन आज़ादी,
मन ही राजा, मन भिखारी॥
मन को जीता—जगत को जीता,
यही कहानी सबसे न्यारी।
नाच रुका तो राज़ ये जाना—
मैं न बंदर, न मैं मदारी।
मैं आत्मा, शिव बाबा की संतान
देख रही हूँ लीला सारी॥
