नैनों में नशा रुहानी है
वाणी में ओज अविराम
जगदम्बा दुर्गा सरस्वती
मम्मा के अनगिन नाम
नैनों में नशा रुहानी है
वाणी में ओज अविराम
जिस पर मम्मा की नजर पडी
वो पत्थर बन गया मोती
लाखों के अंधेरे जीवन में
जलाई रुहानी ज्योती
शत्रु का वार तेरे आगे
पल भर में हुआ नाकाम
नैनों में नशा रुहानी है
वाणी में ओज अविराम
मुस्कान मधुर दृष्टि पावन
तुम पवित्रता की मूरत
सीरत भी उतनी ही सुंदर
जितनी सुंदर तेरी सूरत
कर यज्ञ की सेवा तन मन से
तुम चली प्रभू के धाम
नैनों में नशा रुहानी है
वाणी में ओज अविराम
तेरे नाम के व्रत करती दुनियां
तेरी महिमा कुल संसार करे
तेरा गुणगान करे निशदिन
तेरे चरणों का सब ध्यान करें
मुरली का चढाती ऐसा नशा
जो न उतरे सुबह शाम
नैनों में नशा रुहानी है
वाणी में ओज अविराम
जगदम्बा दुर्गा सरस्वती
मम्मा के अनगिन नाम
नैनों में नशा रुहानी है
वाणी में ओज अविरा
