

सदा स्मृति स्वरूप बनो और दूसरों को भी बनाओ। याद रहे — मैं कौन, पढ़ाने वाला कौन, और हम किस कुल के हैं। जितना स्मृति में रहेंगे, उतना नष्टोमोहा बनेंगे। आसक्ति देखने, सुनने या व्यवहार में होगी तो स्मृति नहीं टिकेगी। मोह केवल देह और संबंधों से नहीं, बल्कि स्वभाव, संस्कार, सेवा, सेवा स्थान और साथियों से भी होता है। जहाँ अटैचमेंट है, वहाँ दुख जल्दी आता है। सतयुग और अपने घर की स्मृति रहे — यही नष्टोमोहा की निशानी है। लेकिन बुद्धि थोड़ी भी पुरानी दुनिया की तरफ खिंची हुई होगी तो नष्टोमोहा नहीं कह सकते। भूल करके बाबा से छिपाना भी नहीं है। 84 जन्म लेने वाली आत्मा हर बात में ऑल-राउंडर होती है, इसलिए हर कर्म में सावधान रहना है। बाबा दूर देश से हमारे लिए स्वर्ग की सौगात लाते हैं। बाबा कहते जो पीस (peace) स्थापन करने वाले होते हैं उन्हें पीस प्राइज मिलती है तो आप मुझे क्या प्राइज देंगे। हम बाबा को क्या दें? सबसे बड़ी प्राइज है — बाप की प्रत्यक्षता। शांत, एकाग्रचित और हर्षित चेहरा ही प्रत्यक्षता का आधार है। अंत समय एक बाबा की ही स्मृति रहे। ज्ञान-योग के अस्त्र-शस्त्र मिले हैं, उनसे खुद को चेक और चेंज करते रहना है।