

दिल सच्चा और साफ हो, सबका भला हो — यही शुभ भावना रहे। अंदर यह दृढ़ संकल्प चलता रहे कि मुझे संपूर्ण और कर्मातीत बनना ही है, तो यह संकल्प कभी अलबेला या सुस्त नहीं बनने देगा। हम चिंताओं से मुक्त हो गए हैं, क्योंकि एक, बाबा मिल गया; जब बाबा से कहा — बाबा, हम आपके हैं, तो बाबा ने भी हमारी जिम्मेदारी उठा ली। दूसरा, ड्रामा का ज्ञान मिल गया कि दुखधाम का पार्ट पूरा हुआ, अब हमारा पार्ट बदल गया है। इस ज्ञान ने व्यर्थ चिंता और चिंतन से मुक्त कर दिया। तीसरा, पुराना कर्ज उतर रहा है और कमाई हो रही है, इसलिए चिंता की बात नहीं। परिपक्व याद वह है — हम स्वयं भी याद में रहें और जो हमारे संबंध-संपर्क में आएं, उन्हें भी बाबा की याद आने लगे। याद से वायुमंडल शांत और शक्तिशाली बनता है। ऐसा वायुमंडल स्वयं ही आत्माओं को खींचता है, जैसे मधुबन का वायुमंडल याद दिलाता है। ऐसी याद में रहने से चढ़ती कला रहती है और “तेरे भाने सर्व का भला” स्वतः होता है। अभी न भय है, न चिंता। भय इसलिए नहीं कि अशरीरी बनने का अभ्यास है, आत्मा का ज्ञान है और आत्मा बाबा की याद में है। चिंता इसलिए नहीं कि बाबा ने चिंतन करना सिखाया है। स्वदर्शन चक्र फिराने से बाबा भी याद आता है और स्थिति मजबूत होती है। बाबा को ज्ञानी-तू-आत्मा प्रिय है। सेवा करने से व्यर्थ और सुस्ती समाप्त हो जाती है। जो बाबा को भूल जाता है, उससे भूलें होती रहती हैं, क्योंकि माया का काम ही बाबा को भुलाना और भूल करवाना है। भोजन पर भी विशेष ध्यान देना है। जिन्हें अपनी अवस्था अच्छी बनानी है, वे प्यार से बाबा की याद में भोजन बनाएं, बाबा को भोग लगाएं और याद में ही ग्रहण करें।