ओ दादी गुलजार थी तुम
बच्चों का भी प्यार थी तुम
नैया की पतवार थी तुम
मुक्ति का भी द्वार थी तुम
ओ दादी गुलजार थी तुम.....
बचपन से ही लगन लगी थी
शिव की ही भक्ति जगी थी
रब के नैनों में नूर सजी थी
बाबा की तुम पधरामनि थी
ईश्वर जैसी साकार थी तुम
ओ दादी गुलजार थी तुम.....
सब रूहों को रब से मिलाया
दादी ने ऐसा किरदार निभाया
मिलते ही हमें गले से लगाया
भगवान का अहसास कराया
ब्राह्मणों का संसार थी तुम
ओ दादी गुलजार थी तुम.....
ओ दादी गुलजार थी तुम
बच्चों का भी प्यार थी तुम
नैया की पतवार थी तुम
मुक्ति का भी द्वार थी तुम
