अनादि ज्योति बिंदु अपना चमकता सितारा , आदि में अपना देवता रूप है अति प्यारा
मध्य में हम पूजनीय हमें पूजे जग यह सारा
अब है संगमवासी ब्राह्मण ब्राह्मण सो बने फ़रिश्ता हम
यही है लक्ष्य हमारा यही है लक्ष्य हमारा
पाँच स्वरूप के अभ्यास से आत्मा में शक्ति भरना है
शक्तिशाली संकल्प से विश्व परिवर्तन करना है
पाँच स्वरूप के अभ्यास से आत्मा में शक्ति भरना है
मन्मनाभव होने का यही है आधार
मन का मालिक बनने का दिलाता अधिकार
व्यर्थ संकल्प की समाप्ति होगी, अलबेलेपन से सदा मुक्ति होगी
जहाँ हम चाहें वहाँ टिक जायें मन को वश में रखना है
पाँच स्वरूप के अभ्यास से आत्मा में शक्ति भरना है
शक्तिशाली संकल्प से विश्व परिवर्तन करना है
मेरा मेरा कहकर बाबा को बना लिया अपना
बाबा ही संसार है कोई नहीं उनके बिना
बाबा ही संसार तो संस्कार भी हों बाबा समान
हम हैं बाबा के बच्चे मास्टर सर्वशक्तिमान
दृढ़ पुरुषार्थ से संस्कारों को मिटाना है
पाँच स्वरूप के अभ्यास से आत्मा में शक्ति भरना है
शक्तिशाली संकल्प से विश्व परिवर्तन करना है
