संपूर्ण मनुष्य (देवता) और परमात्मा की महिमा अलग-अलग है। देवताओं की महिमा — सर्वगुण संपन्न, 16 कला संपूर्ण। परमात्मा की महिमा — पतित-पावन, दुख-हर्ता, सुख-कर्ता, ज्ञान, सुख और शांति का सागर। परमात्मा कभी भी सतो, रजो, तमो अवस्थाओं में नहीं आते।
उत्तम मनुष्य वही हैं जिनका शरीर और आत्मा दोनों पवित्र हों। सतयुग - नई सृष्टि से शुरू होता है, पर उसकी तपस्या संगमयुग (कलियुग के अंत) में की जाती है।
सभी धर्म-स्थापक अपने-अपने धर्म की स्थापना करते हैं, लेकिन परमात्मा नई दुनिया की रचना करते हैं, जहाँ आदि सनातन देवी-देवता धर्म होता है।
परमात्मा ने हमें समय का ज्ञान दिया है, इसलिए समय को सफल बनाना है। बाबा का बनकर रहना है, विकारों पर विजय पाकर पवित्रता अपनानी है। शरीर निर्वाह करते हुए भी कमल-फूल समान जीवन जीना है।
सतयुग में एक धर्म, एक राज्य और एक भाषा होगी — जिसकी स्थापना अभी संगमयुग पर हो रही है। हमेशा याद रखें — हम एक ही परमपिता की संतान हैं।
संगमयुग पर परमात्मा का दिव्य कार्य चलता है। जब-जब धर्म की ग्लानि होती है, परमात्मा आकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। इसीलिए उनकी महिमा की जाती है और उन्हें याद किया जाता है।
