16 कला संपन्न बनने से पहले हममें परिवर्तन की कला होनी चाहिए। मनुष्य से देवता बनना ही परिवर्तन की प्रक्रिया है। यही सच्चा पुरुषार्थ है। हमारे परिवर्तन से ही सृष्टि का परिवर्तन होना है।
यदि हमें याद न रहे कि यह पुरानी दुनिया समाप्त होने वाली है, तो संसारी आकर्षण हमें खींचता रहेगा। तब फरिश्ता, अव्यक्त और बीजरूप स्थिति भी बन नहीं सकती।
सभी अवगुण, बुराइयाँ और विकारों का आधार आकर्षण और विकर्षण है। फरिश्ता वही बनता है, जिसे देह, देह के पदार्थों और देहधारियों से आकर्षण न हो।
ईर्ष्या, घृणा, क्रोध और नफरत विकर्षण से पैदा होते हैं। अभिमान में अपने प्रति आकर्षण और दूसरों के प्रति विकर्षण होता है।
परिवर्तन के लिए पहले मरजीवा बनना होगा। सच्चा ब्रह्माकुमार-कुमारी वही है जिसने मरजीवा जन्म लिया हो।
मुरली परिवर्तन का श्रेष्ठ साधन है। इसे केवल सुनना नहीं, जीवन में अपनाना है। मुरली का हर महावाक्य मुक्ति की युक्ति और सिद्धि की विधि है। सुनते समय अनुभव करें कि बाबा स्वयं मुझसे बात कर रहे हैं।
