

परमात्मा के हैं प्यारे, उनके हम राजदुलारे। प्रभु पालना में पलते, वाह! वाह! भाग्य हमारे। खिल उठी हैं फूल-कलियाँ, मिल रही हैं सारी खुशियाँ। जीवन में आई बहार, पाकर प्रभु का प्यार। दिल में छाई है खुमार। भगवान ही स्वयं हम पर हो गए बलिहार, जिसके दर्शन को तरसे यह संसार, भगवान ही स्वयं हम पर हो गए बलिहार। मन, बुद्धि और संस्कार अपने कर्मचारी। हम हैं राजयोगी, स्व-राज्य के अधिकारी। प्रभु पालना, पढ़ाई, श्रीमत की है बलिहारी। स्व-राज्य का यह अधिकार, भावी राज्य का है आधार। पुरुषार्थ का यही सार। पाकर प्रभु का प्यार, दिल में छाई है खुमार। भगवान ही स्वयं हम पर हो गए बलिहार। सारे कल्प में भी ऊंची अपनी शान। मंदिरों में जिसकी पूजा, वह मूर्ति हम हैं महान। इस ब्राह्मण जीवन का चित्रकार है भगवान। जब देखें हम किसी को, फरिश्ता ही देखें उसको। सबको दें सुख अपार। पाकर प्रभु का प्यार, दिल में छाई है खुमार। भगवान ही स्वयं हम पर हो गए बलिहार । आदि-अनादि अपने संस्कार को जगाएँ। स्वमान और सम्मान से संबंध हम निभाएँ। संतुष्टमणि बनकर संतुष्टता फैलाएँ। संतुष्ट रहना है, संतुष्ट ही करना है, सबको दें यह उपहार। पाकर प्रभु का प्यार, दिल में छाई है खुमार। भगवान ही स्वयं हम पर हो गए बलिहार।