

बाबा ने हमें पवित्रता का मंत्र दिया है। यदि हम हर कदम बाबा की याद में उठाते हैं, तो उसमें पदमों की कमाई है। पवित्रता ही जीवन का मजबूत फाउंडेशन है – सुख और शांति की जननी है। ब्रह्मा बाबा के कदमों पर चलना ही सच्चा ब्रह्माचारी बनना है। यह केवल सन्यासियों के लिए नहीं, बल्कि प्रवृत्ति में रहने वालों के लिए भी है। हमें नया रास्ता नहीं ढूँढना है, बल्कि ब्रह्मा बाबा के पदचिन्हों पर चलकर संपूर्ण बनना है। अंत समय में प्रकृति की हलचल और माया की परीक्षा के समय नष्टोमोहा बनकर ज्वालामुखी योग करना है। कर्मबंधन हम ही बनाते हैं, इसलिए हमे ही उन्हें योग से समाप्त करना है। खाने के समय और ट्रैफिक कंट्रोल पर बाबा की याद करने से कनेक्शन बना रहता है। यदि कोई टीचर अच्छी मुरली समझाता है और हमें वही अच्छा लगता है, तो यह भी एक प्रकार का मोह है। वास्तव में ज्ञान उनका नहीं, बल्कि प्रभु की देन है। जब तक हम देह-अभिमान नहीं छोड़ते, तब तक बाबा से कनेक्शन, धारणा और अनुभव नहीं होता। इसलिए अपने को आत्मा समझकर बाप को याद करना है। यदि हम महीने में 108 घंटे योग-भट्टी करें, तो नेगेटिव और व्यर्थ संकल्प समाप्त हो जाते हैं और ब्रह्मचर्य सहज हो जाता है। किसी से भी बात करते समय उसे आत्मा समझकर बात करें। प्यार और शुभकामना से हम किसी को भी अपना बना सकते हैं। यदि कोई हमें दुख देता है, तो उसे लेना या न लेना हमारे हाथ में है। वास्तव में परेशान लेने वाला होता है, देने वाला नहीं। इसलिए अपनी अवस्था को निर्मल बनाना है।