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पूछती है धरा पूछता है आसमान प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया अनजान अब ना बनो इंसाफ इनसे करो अनजान अब ना बनो इंसाफ इनसे करो हर भरा ये जग करो खुद को माफ तुम करो पूछती है धरा पूछता है आसमान प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया विलुप्त जीव हो रहे विलुप्त है वनस्पति बिलखता है ये मौसम प्यासे है पशु पंछी मुरझाये हुए चमन कहती तपती धरती इनकी लू में वेदना दिशा दिशा जो रोती तेरा मेरा छोड़कर रहम कर्म इनपे करो तेरा मेरा छोड़कर रहम कर्म इनपे करो हर भरा ये जग करो खुद को माफ तुम करो पूछती है धरा पूछता है आसमान प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया पिघल रहे सारे हिमनग उफन रहे है सागर डूब रहे टापू सारे फिर भी हम है बेखबर वातावरण को साफ रख के घर घर ये पैग़ाम दे सजा दे सारे सृष्टि को सभी जिए फिर शान से आंखे बंद मत करो बहरे बनके ना रहो आंखे बंद मत करो बहरे बनके ना रहो हराभरा ये जग करो खुद को माफ तुम करो पूछती है धरा पूछता है आसमान प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया अनजान अब ना बनो इंसाफ इनपे करो अनजान अब ना बनो इंसाफ इनपे करो हर भरा ये जग करो खुद को माफ तुम करो पूछती है धरा पूछता है आसमान प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया —--------------------------------------------