पुरुषार्थ में सच्चाई हो और लक्ष्य स्पष्ट हो — मुझे करना ही है। तब हर सही बात स्वतः समझ में आती है और व्यर्थ बातें छूट जाती हैं। अपनी स्थिति जमाने में मेहनत नहीं लगती। हम स्वयं हलचल में न आएँ, बल्कि हमारी उपस्थिति से वातावरण शांत हो जाए — जैसे बाबा की साइलेंस की शक्ति।
हमें ऐसा बनना है कि “क्या करें, क्या न करें” यह सोच भी न आए। बाबा का आकर्षण हमें शांति और प्रेम में स्थिर कर देता है। अनुभव में ही शक्ति है।
संगठन में जितना स्नेह होगा, उतना परिवर्तन सहज होगा — मेहनत कम, सफलता ज्यादा।
सफलता के चार आधार हैं:
स्वयं की सफलता — सच्चाई, हिम्मत, स्नेह और सहयोग से पुरुषार्थ सफल होता है।
योगबल की सफलता — योग से विकारी दृष्टि समाप्त होती है और विकारों पर विजय मिलती है।
संगठन की सफलता — दोष देखने और कांटे लगाने की आदत बदल जाती है।
विश्व सेवा की सफलता — निमित्त भाव से सेवा, सम्मान देना और संकल्प शक्ति से कार्य स्वतः सफल होता है।
तपस्या ऐसी हो कि सब शांति धाम जाएँ और फिर सुखधाम में आएँ — तभी यज्ञ सफल होगा।
खुद से और बाबा से सच्चे रहना है। “God is Truth” — झूठ से कभी भी लाभ नहीं, बल्कि विकर्म बनते हैं।
किसी के प्रभाव या दबाव में नहीं आना है, सेवा में बहाना नहीं बनाना है।
सच्चे दिल से पुरुषार्थ करें तो लक्ष्मी-नारायण बनना सहज है। जो करेगा, वही पाएगा — हम अपने लिए ही करते हैं। समय कम है — योगबल से सतोप्रधान बनने के लिए बाबा की सकाश दें, जल्दी परिवर्तन होगा।
यज्ञ में रहना, सेवा करना और यज्ञ का अन्न ग्रहण करना — इससे शक्ति मिलती है। बाबा ज्ञान सूर्य और ज्ञान सागर है, सबको समान देता है — हमें उसे पहचानकर लेना है।
बाबा ने हमारे अंदर बीज बोया है — हमें उसे निरंतर सींचना है।
