हम आत्माएँ परमात्मा की प्रियतमा हैं और परमात्मा हमारे प्रियतम हैं। प्रेम, लगन, योग या याद — अर्थ एक ही है। परमात्मा को याद करने से आत्मा को शक्ति मिलती है और उससे हमारा संबंध जुड़ता है।
परमात्मा मनुष्य तन का आधार लेकर आते हैं। शास्त्रों में बूढ़े ब्राह्मण, भागीरथ, नंदीगण आदि के जो चित्र हैं, वे प्रतीक हैं। उनका वास्तविक अर्थ यह है कि परमात्मा साधारण मनुष्य तन में आकर ज्ञान और योग सिखाते हैं तथा हमें पाँच विकारों पर विजय प्राप्त करना सिखाते हैं।
परमात्मा कहते हैं कि भक्ति मार्ग की प्रतीकों का यथार्थ अर्थ समझो। वे स्वयं आकर बताते हैं कि उनका कार्य नई दुनिया की स्थापना करना और मनुष्यों को पवित्र बनाना है।
परमात्मा आकाशवाणी नहीं करते, बल्कि ज्ञान देकर पुरुषार्थ कराते हैं। शास्त्रों और धर्मग्रंथों की ग्लानि नहीं करनी है, बल्कि उनके सही अर्थ को समझना है। जब मनुष्य भ्रमित हो जाते हैं, तब परमात्मा आकर सत्य ज्ञान देते हैं और सही मार्ग दिखाते हैं।
परमात्मा ज्ञान का सागर हैं। वे नई दुनिया की नई नॉलेज देकर हमें स्वर्ग का अधिकारी बनाते हैं। सर्वव्यापी का ज्ञान यथार्थ नहीं है; इसलिए परमात्मा स्वयं अपना परिचय देते हैं।
आज मनुष्य कर्म और धर्म के यथार्थ स्वरूप को भूल गया है। इसलिए परमात्मा आकर पवित्रता, श्रेष्ठ कर्म और श्रीमत का मार्ग बताते हैं। माया से मुक्त होकर ही सच्ची आज़ादी और सुख की प्राप्ति हो सकती है।
