

राजयोग से परमात्मा हमारा साथी बन जाता है—हम उसके संग और वह हमारे संग रहता है। आजकल योग को केवल “तनाव मुक्ति” तक सीमित कर दिया गया है, जबकि यह तो योग रूपी वृक्ष का केवल एक फल है। मुख्य प्राप्ति है—आत्मा और परमात्मा का मिलन और उससे मिलने वाली अनंत विरासत। योग केवल तनाव या बीमारी दूर करने के लिए नहीं है। इससे आत्मा स्वस्थ, शक्तिशाली और पवित्र बनती है। इसके द्वारा विकर्म नष्ट होते हैं, दिव्य गुण प्राप्त होते हैं, और अंततः सर्व प्राप्तियाँ मिलती हैं—यहाँ तक कि “सब कुछ मिल गया” का अनुभव होता है। योग की विशेषता “Health is important, but only health is not important.” योग सर्वगुण प्राप्ति कराता है—सभी इच्छाओं की स्थायी पूर्ति। अन्य किसी पुरुषार्थ से यह संभव नहीं। योग कैसे लगेगा? योग के लिए आधार (भूमि) तैयार करनी पड़ती है— धारणा, मर्यादा और दिव्य गुण आवश्यक हैं: धैर्य, संतोष, सहनशीलता, मधुरता, पवित्रता। इनमें से कोई गुण कम होगा तो योग में बाधा आएगी। मुख्य सिद्धांत इच्छा → संकल्प → कर्म → सुख/दुःख : इसलिए वैराग्य और संतुष्टता जरूरी है। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य जैसे गुण योग के आधार हैं। हमारे योग की विशेषता: राजयोग में हम आत्मा, परमात्मा और परमधाम का स्मरण करते हैं। यह एक रिवोल्यूशनरी योग है, जो ज्ञान पर आधारित है। योग सिखाने की विधि: पहले स्वयं अंतर्मुख होकर, देह-अभिमान से न्यारा होकर बैठें, सामने वाली आत्मा को आत्मिक दृष्टि से देखें, अपनी पावरफुल स्थिति से उसे सहायता दें। योग सिखाना एक जिम्मेदारी है—हमारी स्थिति जितनी शक्तिशाली होगी, उतना ही दूसरे को अनुभव होगा। सेवा का भाव: अगर किसी का योग नहीं लगता, तो सहानुभूति से उसकी मदद करें, उसे समझाएँ—कई बार सांत्वना भी योग लगाने में सहायक होती है।