

हमारी सूरत और मूरत ऐसी हो कि पता पड़ जाए — हम कहाँ के रहने वाले हैं, कौन हमें पढ़ाता है और किसने हमें पालना दी है। पहले अपने ऊपर दुआ, रहम और कृपा करनी है। रूहानियत के रुहाब में रहना ही रहमदिल बनना है — जहाँ रोब समाप्त हो जाए और देह-अभिमान न रहे। जब हम रहमदिल बनकर बाबा की बातों को जीवन में लाते हैं, तो यही अपने ऊपर कृपा करना है। अपनी पर्सनैलिटी में सच्चाई और वास्तविकता होनी चाहिए। किसी के बारे में व्यर्थ चिंतन नहीं करना है। शुभ भावना रखें, सच्चाई और स्नेह से सहयोग दें । व्यर्थ चिंतन से बुद्धि बंद हो जाती है और बाबा से योग नहीं लग पाता। इसलिए केयरफुल और क्लियर रहना है। जब हम स्वयं पर दुआ करते हैं और परिवर्तन लाते हैं, तो दूसरों को प्रेरणा मिलती है। उस प्रेरणा से उनमें जो परिवर्तन आता है, उससे हमें दुआएँ मिलती हैं। इसलिए — अपने ऊपर दुआ करने से ही दुआएँ मिलती हैं। बाबा कहते हैं — सेवा करते हो तो उसका प्रमाण भी दो। निःस्वार्थ भाव से सेवा करो। सेवा के साथ स्थिति भी श्रेष्ठ होनी चाहिए । श्रेष्ठ स्थिति से ही बाबा की दिल पर चढ़ते हैं। न किसी को अपना आधार बनाना है, न किसी का आधार बनना है। बाबा ने हमें ज्ञान का तीसरा नेत्र दिया है — अर्थात समझ की दृष्टि दी है। न किसी में बुरा देखना है, न किसी का अच्छा देखकर प्रभावित होना है।