

मेरा लौकिक नाम लक्ष्मी है, बाबा ने मुझे रतनमोहिनी नाम दिया। बचपन से ही, जब ज्ञान-यज्ञ की स्थापना हुई, तभी से हम इस ज्ञान मार्ग में आए। माता जी के साथ पहली बार सत्संग में गए, जहाँ “ॐ” की ध्वनि और बहुत ही शांत वातावरण था। मैं भी वहाँ गहरी शांति में बैठ गई—पता ही नहीं चला कि 1–2 घंटे बीत गए। लौकिक परिवार में भी भक्ति का वातावरण था। माता जी श्रीकृष्ण की भक्त थीं, इसलिए बचपन से ही हमें भी भक्ति के संस्कार मिले। जब पहली बार सत्संग में आए, उस समय पिता श्री ब्रह्मा बाबा कश्मीर में थे। बाद में जब उन्हें देखा, तो ऐसा लगा—यही मेरा बाप है, यही मेरा परिवार है। सहज ही उनसे बुद्धियोग जुड़ गया। शुरू में घर से आने की अनुमति नहीं मिली, क्योंकि पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा गया। लेकिन हमारा मन था कि पढ़ाई भी यहीं करें। उस समय बाबा ने बच्चों के लिए एक छोटा स्कूल शुरू किया था, जहाँ हिन्दी, अंग्रेज़ी और ज्ञान की पढ़ाई होती थी। इस प्रकार हमें वहाँ रहने की अनुमति मिल गई। पढ़ाई में रुचि होने के कारण मुझे शुरू से ही बड़े बच्चों की कक्षा में बैठाया गया। जैसे-जैसे ज्ञान सुनती गई, अनुभव होता गया कि यह बहुत ऊँची नॉलेज है, जो परमात्मा के सिवाय कोई नहीं दे सकता। बाबा का स्वरूप भी साधारण नहीं लगता था—अधिकतर विष्णु स्वरूप का अनुभव होता था। इस कारण सहज ही निरंतर चिंतन और याद बनी रहती थी। थोड़े समय बाद हैदराबाद से सब कराची चले गए, और वहीं बाबा के साथ रहते हुए 14 वर्षों तक योग-भट्ठियों और तपस्या में समय बिताया। योग में ऐसा अनुभव होता था मानो बाबा कह रहे हों—“तुम शिव शक्तियाँ हो”—और उन शक्तियों का अनुभव भी होता था। बाद में हम आबू आए। वहाँ पहाड़ियों पर जाकर एकांत में तपस्या करते थे। सेवा के लिए दिल्ली, लखनऊ, मुंबई आदि स्थानों पर भी जाना हुआ। विजय कोठी (आबू) में रहते समय जंगल का वातावरण था, रात को शेरों की आवाजें भी आती थीं, लेकिन यह विश्वास था कि परमात्मा साथ हैं—इसलिए डर नहीं लगता था। विदेश सेवा के लिए भी निमंत्रण मिले। पहली बार जापान में विश्व शांति सम्मेलन में गए। भाषा अलग होने के बावजूद, अंग्रेज़ी के माध्यम से ज्ञान का संदेश दिया। वहाँ बुद्धिस्ट संस्थाओं में “कल्प वृक्ष” के चित्र द्वारा समझाया, जो बहुत सराहा गया। बाद में सिंगापुर और हांगकांग में भी सेवा की। भारत लौटने पर चित्रकूट में साधु-संतों के सम्मेलन में सेवा का अवसर मिला। आगे चलकर 1972–74 में लंदन में भी सेवा की, जहाँ सेवाकेंद्र की स्थापना के समय ज्ञान को स्थापित करने का कार्य किया। वर्तमान में माउंट आबू में रहकर टीचर्स ट्रेनिंग, क्लासेस और विभिन्न सेवाओं की जिम्मेदारी निभाई। राजस्थान के सेंटर्स की सेवा और यज्ञ के प्रशासनिक कार्यों में भी योगदान रहा। इस ज्ञान का मुख्य उद्देश्य है—जीवन को शांत, श्रेष्ठ और संतुष्ट बनाना। जब आत्मा परमात्मा से अपना संबंध पहचानकर योग में जुड़ती है, तो मन एकाग्र और शांत हो जाता है। अगर हम दूसरों के प्रति शुभ भावना रखते हैं, तो उनके मन में भी हमारे लिए शुभ भावना उत्पन्न होती है। स्नेह से एकता आती है, और एकता से मन स्थिर और शांत रहता है।